शाम का समय था. कविता पार्क में एक बैंच पर बैठी थी. बैंच पर उस के बराबर में एक बच्चा खेलतेखेलते थक कर बैठा तो कविता का मन हुआ बच्चे के मासूम चेहरे पर बहते पसीने को अपने दुपट्टे से पोंछ दे लेकिन कुछ ही दूरी पर टहलते उस के मातापिता कहीं अन्यथा न लें, यह सोच कर वह अपनी इच्छा मन में दबाए चुपचाप बच्चे को देखती रही. बच्चे ने उसे अपनी तरफ देखते पाया तो सकुचा कर अपने मम्मीपापा की ओर दौड़ पड़ा. उस महिला ने बांहें फैलाईं और बच्चा मां की गोद में चढ़ गया और यह दृश्य देख कर कविता का मन ममता से भीग गया. उस की आंखें भर आईं. क्या कभी उस की बांहों में कोई ऐसे ही दौड़ कर नहीं आएगा? क्या वह ऐसे ही जीती रहेगी?

सबकुछ है उस के जीवन में, एक बेहद प्यार करने वाला पति, सारी भौतिक सुखसुविधाएं लेकिन जीवन की इस कमी का क्या करें. कितना कुछ हुआ इन 7 सालों में, कितने सपने देखे, कुछ पूरे हुए कुछ टूट कर बिखर गए. वह कभी हंसती, कभी रोती रही लेकिन जीवन का सफर यथावत चलता रहा. समय को तो गुजरना ही है. उस में किसी के सुखदुख के लिए ठहराव की गुंजाइश ही कहां है.कितने टैस्ट हुए थे, उसे याद आया, विनय ने सारी रिपोर्ट्स आने के बाद जब उसे बताया था कि वह कभी मां नहीं बन सकती तो कविता इस मानसिक आघात से कितनी विचलित हुई थी और विनय ने ही कैसे प्यार से उसे समझाया था.

आंखों से बहते आंसुओं का गीलापन जब गालों को छूने लगा तो एहसास हुआ कि वह पार्क में बैठी है. अंधेरा होने लगा था. घड़ी देखी, विनय के औफिस से आने का समय हो चुका था. घर चलना चाहिए, सोच कर पार्क में खेलते बच्चों पर एक नजर डाल कर वह उदास मन से लौट आई और विनय के आते ही उस का मूड एकदम बदल गया. विनय की प्यारभरी बातों ने उस के चेहरे की उदासी को हमेशा की तरह हंसी में बदल दिया. चाय बनातेबनाते उसे कभी कहीं पढ़े हुए इमर्सन के एक निबंध ‘फिलौसफी औफ कम्पैन्सेशंस’ की पंक्तियां याद आ गईं. निबंध के अनुसार, ‘प्रकृति और जीवन मनुष्य की हर त्रुटि, हर हानि, हर अभाव का कोई न कोई मुआवजा, किसी न किसी रूप में अदा कर देते हैं. जीवन के मुआवजे सदा ही प्रदर्शनात्मक नहीं होते. जीवन ऊपरऊपर से बहुत कुछ हर कर कोई ऐसी आंतरिक निधि दे सकता है कि उस से बड़ेबड़े धनाधिपतियों को ईर्ष्या हो.’

कविता को लगा सच ही तो है. इतना प्यार करने वाला पति है जो उस के हर सुखदुख को बिना कहे समझ लेता है, वह क्यों एक ही बात सोचसोच कर बारबार उदास हो जाती है. दोनों चाय पी ही रहे थे कि लखनऊ से विनय के बड़े भाई अजय का फोन आया. अजय की पत्नी रेखा गर्भवती थी और अब डिलीवरी के समय उन्हें कविता की सहायता चाहिए थी. विनय के पिता का देहांत हो चुका था. विनय की मम्मी कावेरी कभी लखनऊ में अजय के पास रहती थीं, कभी विनय और कविता के पास मुंबई आ जाती थीं. आजकल रेखा गर्भवती थी तो वे काफी समय से लखनऊ में ही थीं. विनय के बिना जाने का कविता का मन तो नहीं था लेकिन वह अपने कर्तव्य से पीछे हटना भी नहीं चाहती थी. रेखा के मातापिता इस समय विदेश में अपने बेटे के पास थे और डिलीवरी के समय कावेरी अकेली सारा काम संभाल नहीं सकतीं थीं, कविता को ही जाना था. कविता को उदास देख कर विनय ने वादा किया कि वह भी छुट्टी ले कर बीच में लखनऊ का चक्कर लगाएगा. विनय ने कविता का फ्लाइट का टिकट बुक करा दिया. दूसरे ही दिन वह रेखा के पास पहुंच गई.

सब उसे देख कर खुश हो गए. रेखा किसी भी समय बच्चे को जन्म दे सकती थी. रेखा की एक बेटी अनन्या 4 साल की थी. वह चाचीचाची कह कर कविता की गोद में चढ़ी रहती. वह कविता से बहुत घुलमिल गई थी. रेखा ने भी चैन की सांस ली कि अब उस के हौस्पिटल में रहने पर अनन्या परेशान नहीं होगी, कविता उसे संभाल लेगी.

कुछ समस्या होने पर डिलीवरी के लिए रेखा का औपरेशन करना पड़ा और उस ने एक स्वस्थ बेटे को जन्म दिया. बेटे का नाम अपूर्व रखा गया. कावेरी हौस्पिटल में रहती. कविता कुछ देर हौस्पिटल और फिर घर आ कर अनन्या को और बाकी काम संभाल लेती. नन्हे अपूर्व को जब कविता अपने हाथों में लेती तो उसे वह सुख दुनिया का सब से बड़ा सुख लगता. अपूर्व के छोटेछोटे हाथपैरों की छोटीछोटी उंगलियों और उस के बालों को छूती तो किसी और ही दुनिया में पहुंच जाती. उसे लगता मातृत्व एक भावना है जो कोख से नहीं बल्कि हृदय से बहती है. मातृत्व एक छोटा सा शब्द है जो अपनेआप में पूरा संसार समेटे है. यह एक ऐसा सुखद एहसास है जो कई जिंदगियों को बदल देता है. कावेरी और रेखा दोनों ही उस की मनोदशा समझती थीं. सब उस से बहुत ही प्यार से पेश आते थे.

एक दिन उस ने कावेरी और रेखा के लिए टिफिन तैयार कर के अजय को दिया. अजय ने कहा, ‘‘मेरा खाना टेबल पर रख देना. मेरे पास चाबी है, तुम अनन्या के साथ सो जाना, मुझे शायद थोड़ी देर हो जाएगी.’’

‘‘ठीक है, भैया,’’ कह कर कविता ने गेट बंद किया. अनन्या के कमरे में उस के साथ लेट कर उसे सुलाने लगी. उस की आंख भी लग गई. अचानक लाइट गई तो कविता की आंख खुली, देखा अजय भैया अभी तक नहीं आए थे. उमस और गरमी से परेशान हो कर वह छत पर चली गई. छत पर चांदनी फैली हुई थी. उसे विनय की याद आ गई. हवा के झोंके उस की उदासी को थपकने लगे लेकिन इन थपकियों ने उस के दिल को और उदास कर दिया. कविता पसीना सुखाने के लिए बाल खोल कर उंगलियों से कंघी सी करने लगी. हवा ने जल्दी ही गरमी से उसे छुटकारा दिला दिया. बाल लहरा रहे थे और अचानक अजय उस के सामने आ कर खड़ा हो गया. बेहद करीब. उसे देख कर कविता ऐसी अचकचाई कि आंखें फाड़े उसे देखती रह गई. अचानक वह कुछ घबराई और उस का दिल जोर से धड़कने लगा. चांद की रोशनी में भी अजय की आंखों की चमक में कुछ ऐसा था जो कविता को पलभर के लिए कुछ खटका.

कविता ने ही उस अजीब से पल का मौन तोड़ा, ‘‘भैया, आप कब आए? आप ने खाना खाया?’’

अजय ने न में गरदन हिलाई.

‘‘चलिए, आप का खाना लगा देती हूं,’’ कह कर वह नीचे आ गई. लाइट आ चुकी थी. अजय चुपचाप बैठ कर खाना खाने लगा. इस दौरान अजय ने कोई बात नहीं की. कविता ने स्वयं को सामान्य दर्शाते हुए पूछा, ‘‘भाभी और अपूर्व कैसे हैं?’’

‘‘ठीक हैं,’’ बस इतना ही कहा अजय ने.

‘‘अच्छा भैया, अब मैं सोने जा रही हूं. अनन्या सो रही है आप के कमरे में,’’ कविता अपने रूम में आई. कोई आहट पा कर जैसे ही मुड़ी, पीछे अजय दरवाजा बंद कर रहा था. कविता चौंक पड़ी, गुस्से से बोली, ‘‘भैया, यह क्या है? आप यहां से फौरन चले जाइए.’’

अजय ने कुछ नहीं कहा और उस की तरफ हाथ बढ़ा कर उसे अपनी ओर खींच लिया. फिर बैड पर जबरदस्ती लिटा दिया. कविता ने अजय की गिरफ्त से छूटने की भरपूर कोशिश की लेकिन कविता की नाजुक देह ज्यादा देर तक अजय की बलिष्ठ देह का विरोध नहीं कर पाई. कविता छटपटाती रह गई. तनमन छलनीछलनी हो गया. इस कुकर्म के बाद अजय कमरे से निकल गया. कविता व्यथित, परेशान, भीतरबाहर जैसे एक आग में झुलसतीसुलगती रही. उसे लग रहा था जैसे कमरे की छत, दीवारें आदि सब भरभरा कर ऊपर आ गिरेंगी. एक भयानक भूकंप, सर्वस्व उजाड़ देने वाला भूकंप सबकुछ तहसनहस कर जैसे उस के ऊपर से गुजर गया था. मन हुआ इसी समय विनय को फोन कर के उस के बड़े भाई की चरित्रहीनता के बारे में बताए. कविता ने अपने कपड़े व्यवस्थित किए, मुंह पर पानी के छींटे मारे तब जा कर उसे थोड़ा होश आया. सारी रात क्रोध व घृणा में उठतीबैठती रही.

सुबह हुई तो रात की घटना दुस्वप्न की तरह दिल में चुभ रही थी. नहाने गई तो देर तक नहाती रही. वह अपने शरीर से रात की सारी कालिख धो डालना चाहती थी. जब नहा कर निकली तो शरीर के साथ ही उस का मन भी काफीकुछ धुल चुका था.कविता ने अपनेआप को संभाला. उस ने सोचा एक भयानक दुर्घटना, जिस में उस का कोई दोष नहीं है, के चलते अपनी बसीबसाई गृहस्थी में आग लगा देना समझदारी नहीं होगी. विनय के दिल में अपने भाई के लिए बहुत ही प्यार व आदर है. रिश्तों में दरारें पैदा हो जाएंगी, परिवार की बदनामी होगी, रेखा भाभी को कितनी तकलीफ पहुंचेगी, मां को कितनी शर्मिंदगी होगी, अनुमान लगाना मुश्किल न था. इसलिए उस ने सोचा कि इस बात को यहीं भुला देना ही ठीक रहेगा.

कमरे से बाहर आई तो देखा अजय अनन्या को ले कर हौस्पिटल जा चुका था. सोचा, अच्छा ही हुआ इस समय अजय भैया यहां नहीं हैं. ‘भैया’ शब्द सोचते ही मन कसैला हो गया. उसे सारे रिश्ते एकदम झूठे से लगे. इतने में विनय का फोन आ गया. कविता उस की आवाज सुनते ही फूटफूट कर रो पड़ी. विनय परेशान हो गया. उसे यही लगा कि वह उस के बिना उदास है. विनय ने कहा, ‘‘कविता, मैं ने बहुत कोशिश की लेकिन कुछ जरूरी काम है, मैं नहीं आ पाऊंगा. जैसे ही भाभी घर आएं, तुम आ जाना. मैं मां से बात कर लूंगा.’’

कविता फोन रखने के बाद भी बहुत देर तक सिसकती रही.अब वह यहां एक दिन भी रुकना नहीं चाहती थी और अजय का तो चेहरा भी देखना नहीं चाहती थी. महरी आई तो उस ने सब साफसफाई करवाई, घर के काम बुझे मन से निबटाए. अजय लंच के समय आया तो वह खाना रख कर अपने कमरे में चली गई. जब अजय ने दरवाजा नौक किया तो वह चौंक गई. उसे इस की उम्मीद नहीं थी. कविता ने दरवाजा नहीं खोला तो अजय ने बाहर से ही कहा, ‘‘कविता, कुछ कहना है एक बार सुन लो.’’

कविता ने दरवाजा खोला तो अजय सिर झुकाए खड़ा था. नजरें नीची किए बोला, ‘‘जो कुछ हुआ उस के लिए मैं शर्मिंदा हूं. हो सके तो मुझे माफ कर देना. सौरी,’’ कह कर अजय चला गया.कविता को बहुत गुस्सा आया. घर में आई छोेटे भाई की पत्नी की इज्जत से खेल कर बाद में माफी मांग लेना पुरुष के लिए कितना आसान है, सोच कर उसे घिन सी हुई. अजय जा चुका था. उसी दिन रेखा डिस्चार्ज हो गई तो कविता की जान में जान आई. उस का उतरा मुंह देख कर कावेरी और रेखा चौंक गईं. रेखा ने उसे गले से लगाया तो कविता की आंखें भर आईं. बस, उस ने तबीयत ढीली होने का बहाना बना दिया.अगले दिन ही विनय ने फोन पर कविता के बिना होने वाली खानेपीने की परेशानियों का जिक्र किया तो कावेरी ने ही कहा, ‘‘अब कोई परेशानी नहीं है. मैं कविता को वापस भेज देती हूं.’’

2 दिन बाद ही कावेरी ने अजय से कविता का टिकट बुक करने के लिए कह दिया और कविता मुंबई आ गई. विनय की बांहों में सिमटते ही कविता फिर रो पड़ी. विनय ने इसे अपने से दूर रहने का कारण समझा. कविता ने विनय को कुछ नहीं बताया. इस का एक बड़ा कारण यह भी था कि अगर दोनों भाइयों का रिश्ता बिगड़ जाता तो कावेरी को बहुत दुख होता और अनाथ कविता को कावेरी में हमेशा एक ममतामयी मां दिखाई दी थी और वह उन्हें दुख नहीं पहुंचाना चाहती थी. लगभग 2 महीने बाद कविता के जीवन में वह दिन आया जिस का उसे सालों से इंतजार था. डाक्टर ने उसे बताया कि वह मां बनने वाली है, तो वह खुशी से झूम उठी. घर पहुंचते ही उस ने विनय को सरप्राइज देने की सोची. पूरा घर अच्छी तरह सजाया. बढि़या डिनर तैयार किया. खूब सजसंवर कर विनय के आने की प्रतीक्षा करने लगी. विनय आया तो कविता और घर को देख कर चौंक गया. जब कविता ने विनय को खुशखबरी सुनाई तो जैसे तूफान आ गया. विनय के सिर पर जैसे खून सवार हो गया. उस ने टेबल पर रखा सारा सामान उठा कर फेंक दिया.

विनय चिल्लाने लगा, ‘‘तुम धोखेबाज हो, चरित्रहीन हो.’’

कविता को कुछ समझ नहीं आ रहा था, ‘‘विनय, तुम यह कैसा व्यवहार कर रहे हो? यह सब क्या है?’’

‘‘तुम ने मुझे धोखा दिया है कविता, तुम चरित्रहीन हो.’’

‘‘यह झूठ है. मैं ने तुम्हें कभी कोई धोखा नहीं दिया. ऐसा कैसे सोच सकते हो तुम? कितने सालों बाद आज हमें यह खुशी मिली है, क्या हो गया है तुम्हें?’’

विनय चिल्लाया, ‘‘यह मेरा बच्चा नहीं है.’’

कविता को भी गुस्सा आ गया, ‘‘क्या बकवास कर रहे हो?’’

‘‘यह बकवास नहीं है, जब हमारे टैस्ट हुए थे, कमी मुझ में थी, तुम में नहीं.’’

कविता पर जैसे कोई बम फट पड़ा हो, बोली, ‘‘तुम ने इतना बड़ा झूठ बोला कि मैं मां नहीं बन सकती.’’

‘‘एक तो यह मेरा पुरुषोचित अहं था कि मैं अपनी कमजोरी स्वीकार नहीं कर सका और दूसरे, मैं डरता था कि कहीं संतान की इच्छा में तुम मुझे छोड़ न दो,’’ विनय का स्वर पिघलने लगा था, ‘‘मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं कविता, मैं तुम्हारी इस भूल को भी माफ कर दूंगा लेकिन इस बच्चे को स्वीकार नहीं कर पाऊंगा.’’

‘‘कोई भूल नहीं की है मैं ने, मेरे मन में आप के सिवा कोई नहीं था, मैं तो एक हादसे का शिकार हो गई थी. आप को इसलिए नहीं बताया कि मैं उस बुरे सपने को खुद ही भूल जाना चाहती थी लेकिन दोनों ही पुरुषों ने मेरे साथ छल किया है. आप ने संतान न होने का दोष मेरे सिर मढ़ दिया, खुद महान बन बैठे और मैं यह सोच कर अपराधबोध में ग्रस्त रही और इसी दुख में जीती रही कि मैं आप को संतान नहीं दे सकती. और दूसरे पुरुष ने अपनी हवस पूरी करने के लिए…’’ कविता ने कहतेकहते अपने गालों पर बहते आंसू पोंछे. फिर दृढ़ स्वर में बोली, ‘‘लेकिन मैं अपने साथ और छल नहीं होने दूंगी. यह मेरा बच्चा है, इस की मां भी मैं हूं और बाप भी,’’ कविता की आवाज फिर भर्रा गई. कमरे में मरघट का सा सन्नाटा फैला हुआ था. फर्श पर पड़े बरतनों का खाना, कांच के टूटे टुकड़े जैसे अभी कुछ देर पहले एक तूफान आया था जिस ने कविता के संपूर्ण अस्तित्व को ही नहीं बल्कि उस की आस्था, विश्वास को भी छलनी कर दिया था.

विनय भी सिर झुकाए चुपचाप बैठ गया था. कविता ने ही फिर कहना शुरू किया, ‘‘मैं ने पतिव्रत धर्म का हमेशा पूरे मन से पालन किया है. कभी परपुरुष के बारे में नहीं सोचा लेकिन मैं अपने नारीत्व के साथ छल नहीं करूंगी. मातृत्व मेरा अधिकार है और मैं इस बच्चे को जन्म दूंगी.’’

‘‘नहीं कविता, मैं इस बच्चे को स्वीकार नहीं करूंगा. तुम एबौर्शन करवा लो. मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं. हम दोनों नई शुरुआत करेंगे.’’

‘‘नहीं, मैं इस बच्चे को नहीं मारूंगी. तुम्हें यह स्वीकार नहीं है तो मैं ही घर छोड़ कर चली जाऊंगी.’’

काफी देर तक दोनों में बहस हुई. फिर कविता ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं चली जाती हूं. जो भी कुछ हुआ उस में इस नन्ही जान का क्या कुसूर है?’’ कविता ने चुपचाप खड़े हो कर पलभर सोचा, फिर अपना सामान बैग में भरने लगी. उसे जाता देख विनय सिसक उठा, ‘‘रुक जाओ कविता, मुझे माफ कर दो, यह तुम्हारा घर है, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह पाऊंगा.’’

‘‘मैं भी नहीं जाना चाहती लेकिन मेरा बच्चा इस दुनिया में जरूर आएगा.’’

‘‘ठीक है, मुझे मंजूर है जैसा तुम चाहो.’’‘‘अच्छी तरह सोच लो विनय, यह सारी उम्र की बात है.’’

विनय ने कविता का हाथ पकड़ लिया, ‘‘मैं पलभर को स्वार्थी हो गयाथा. क्रोध में आ कर पता नहीं क्याक्या तुम्हें कह बैठा. तुम मेरी हो. तुम्हारा अंश भी मेरा है. मैं उस का पालनपोषण करूंगा तो वह मेरा ही होगा न. मैं ने तुम्हारा दिल बहुत दुखाया है. मुझे माफ कर सकोगी न?’’

‘‘लेकिन क्या आप उस के बाप के बारे में जानना चाहेंगे?’’ पूछतेपूछते कविता का स्वर कांप गया.

‘‘बस, तुम इस की मां हो. मैं इस का पिता. तुम मेरी हो और यह हमारा है. यही सच है,’’ कहतेकहते विनय ने कविता को अपने सीने से लगा लिया.

कविता की आंखें भर आईं. जीवन में आए इस परिवर्तन के लिए दोनों ने अपनेआप को मानसिक रूप से तैयार किया. धीरेधीरे उन्होंने बदली परिस्थितियों में खुद को ढाल लिया. जीवन अब सामान्य गति से चलने लगा था. पहले शिशु के जन्म का स्वाभाविक उत्साह तो विनय के स्वभाव में ज्यादा स्पष्ट नहीं था लेकिन कविता के शारीरिक परिवर्तनों पर वह सामान्य रूप से बात करता. कविता की भविष्य की योजनाओं में रुचि दिखाता. कविता के चेहरे पर रहने वाली चमक उसे अच्छी लगती. कविता उस की मनोदशा समझती थी. स्वयं को भरसक सामान्य रखती. उधर लखनऊ में रेखा भाभी यह खुशखबरी सुन कर बहुत प्रसन्न हुई थी. उसे कविता हमेशा अपनी छोटी बहन जैसी लगती थी. देवरानीजेठानी के रिश्ते को अनदेखा कर दोनों ने हमेशा एकदूसरे को सगी बहनों जैसा प्यार व सम्मान दिया था.

कुल मिला कर देखने में सब सामान्य था. फिर वह दिन भी आ गया जब कविता ने एक स्वस्थ व सुंदर बेटे को जन्म दिया. लखनऊ से कावेरी और रेखा भी बच्चों के साथ आ गई थीं. अजय नहीं आया था. कविता को मन ही मन यह ठीक लगा था. वह अजय का सामना करना भी नहीं चाहती थी. कावेरी घर पर रह कर घर के काम और बच्चों को देख लेती और रेखा कविता के पास हौस्पिटल में रहती. एक दिन कविता ने रेखा से कहा, ‘‘दीदी, आप ही रखना इस का नाम.’’

रेखा हंस पड़ी, ‘‘ठीक है, दिव्यांशु कैसा रहेगा?’’

‘‘बहुत अच्छा है. बस, यही है इस का नाम.’’

रेखा रातदिन कविता और दिव्यांशु का ध्यान रखती. कविता हौस्पिटल से घर आ गई तो उसे लगा कि कावेरी कुछ गंभीर है, उस ने पूछा भी, ‘‘मां, क्या तबीयत ठीक नहीं है?’’

कावेरी ने जबरदस्ती मुसकराते हुए कहा, ‘‘नहीं, नहीं, मैं बिलकुल ठीक हूं, तुम्हें ऐसे ही लगा होगा.’’

विनय ने जब बच्चे को गोद में लिया तो उसे शुरू में तो बहुत अजीब लगा लेकिन धीरेधीरे वह उस नन्हे से अस्तित्व के आकर्षण में बंधता चला गया. अतीत में जो कुछ हुआ था, उस ने अपने दिमाग से निकाल फेंका था. अनन्या का स्कूल था, उस की और ज्यादा छुट्टियां नहीं करवाई जा सकती थीं, सो, रेखा बच्चों के साथ चली गई और कावेरी कविता और दिव्यांशु की देखभाल के लिए रुक गई. समय अपनी रफ्तार से चलता रहा. अब दिव्यांशु 7 साल का हो गया था. इस बीच कावेरी कभी लखनऊ, कभी मुंबई आतीजाती रहती थी. कविता तो उस घटना के बाद कभी लखनऊ नहीं गई थी. रेखा छुट्टियों में बच्चों के साथ मुंबई आ जाती थी और अजय कभी मुंबई नहीं आया था. इतने सालों में अजय और कविता का फिर आमनासामना नहीं हुआ था. एकदो बार विनय अकेला ही लखनऊ गया था. कविता ने कुछ न कुछ बहाना बना दिया था और दिव्यांशु के साथ मुंबई में ही रही. रेखा जब भी आती, दिव्यांशु के लिए ढेर सारे उपहार लाती और दिव्यांशु, वह तो रेखा को देखते ही उस से चिपक जाता और बड़ी मम्मी, बड़ी मम्मी कहते न थकता. दिव्यांशु ने सब को एकदूसरे के और करीब कर दिया था.

एक दिन अनहोनी हो गई. कविता का फ्लैट थर्ड फ्लोर पर था. एक दिन सीढि़यों पर ही दिव्यांशु अपने दोस्तों के साथ रेलिंग की तरफ खड़ा था. रेलिंग कमर तक थी. ऊपर से ग्रिल नहीं थी. सब बच्चे मस्ती कर रहे थे कि अचानक एक बच्चे ने दिव्यांशु को जोर से धक्का दिया तो उस का संतुलन बिगड़ गया और वह नीचे जमीन पर जा कर गिरा. खून की धारा बह निकली. भगदड़ मच गई. गार्ड ने तुरंत इंटरकौम से कविता को दुर्घटना की खबर दी तो कविता के होश उड़ गए. बिल्डिंग के लोग इकट्ठा हो गए. कुछ पड़ोसी मिल कर बेहोश दिव्यांशु को तुरंत हौस्पिटल ले कर भागे. किसी ने विनय को भी फोन कर दिया. खून से लथपथ दिव्यांशु को गोद में लिए हुए कविता की हालत देख कर सब की आंखें नम हो गई थीं. दिव्यांशु को ऐडमिट कर दिया गया. हाथ और पैर की हड्डी टूट गई थी. सिर में बहुत चोट थी. वह अभी बेहोश था. विनय हौस्पिटल पहुंच चुका था. वह कविता को बहुत तसल्ली दे रहा था.

उस का दिल भी कांप रहा था. कविता को संभालना बहुत मुश्किल हो रहा था. उस ने इस दुर्घटना की खबर लखनऊ में भी दे दी. उसी दिन शाम तक फ्लाइट से सब पहुंच गए. कावेरी और रेखा ने कविता को बहुत समझासमझा कर संभाला. अजय चुपचाप बच्चों के साथ दुखी हो कर खड़ा रहा. तभी डाक्टर ने कहा, ‘‘बहुत खून निकल गया है, हमें तुरंत ब्लड चाहिए.’’

विनय ने तुरंत कहा, ‘‘चलिए, मैं चलता हूं, आप चैक कर लीजिए.’’ लेकिन उस का ब्लडग्रुप दिव्यांशु से मैच नहीं हुआ. विनय का मुंह लटक गया. इतने में रेखा अजय को एक तरफ ले जा कर बोली, ‘‘आप जाइए, आप का ब्लडग्रुप दिव्यांशु के ब्लडग्रुप से जरूर मैच होगा.’’

अजय ने उस की ओर असमंजस भरी नजरों से देखा तो रेखा बोली, ‘‘देख क्या रहे हैं? जाइए न, एक पिता का ब्लडग्रुप अपने बेटे के ब्लडग्रुप से जरूर मैच करेगा.’’

अजय पर जैसे बिजली गिरी. वह अपनी जगह खड़ाखड़ा हिल गया. कांपते स्वर में पूछा, ‘‘मतलब, तुम जानती हो? कैसे? और इतने दिन…?’’

‘‘हम ये सब बातें बाद में कर लेंगे, अभी आप डाक्टर के साथ जाइए.’’

और फिर अजय का ब्लडग्रुप दिव्यांशु से मैच हो गया. सब की जान में जान आई. अब दिव्यांशु खतरे से बाहर था लेकिन उसे अभी होश नहीं आया था. सब की पूरी रात आंखों में कटी थी. अगले दिन दिव्यांशु को होश आया तो सब ने चैन की सांस ली. उसे आईसीयू से वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया. उस के हाथपैर का प्लास्टर और सिर पर बंधी पट्टियां देख कर सब का कलेजा मुंह को आ रहा था. बाहर अजय चुपचाप नीची गरदन किए अपनी सोच में गुम चेयर पर अकेला बैठा था. रेखा ने उस के बराबर वाली चेयर पर बैठ कर उस के हाथ पर हाथ रखा तो वह चौंका, रेखा से नजरें नहीं मिला पाया. रेखा ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘क्या सोच रहे हैं?’’

अजय उस की ओर देखे बिना ही बोला, ‘‘तुम जानती थीं, कैसे? रेखा, मुझ से बहुत बड़ा गुनाह…’’

रेखा ने उस की बात पूरी नहीं होने दी, बोली, ‘‘तुम्हें अपमानित और शर्मिंदा नहीं करना चाहती थी. जब मैं अपूर्व के जन्म के बाद हौस्पिटल से लौटी थी तो कविता को बहुत उदास व दुखी पाया था. बारबार पूछने पर भी उस ने कुछ नहीं बताया था और मैं ने तुम्हें और उसे एक बार भी फिर एकदूसरे के सामने नहीं देखा जबकि हौस्पिटल जाने से पहले ऐसा नहीं था. मुझे कुछ खटका हुआ था लेकिन मैं किसी से कुछ कह नहीं पाई. कविता उस समय मुंबई चली आई थी. और उस के बाद कभी लखनऊ नहीं आई. और तुम ने मेरे साथ यहां आने का नाम भी कभी नहीं लिया. मुझे हमेशा अकेला भेजा, मुझे बड़ा अजीब सा लगता रहा और जब कविता ने अपने मां बनने की खबर हमें फोन पर सुनाई तो मैं सचमुच बहुत खुश हुई थी लेकिन मांजी और आप के चेहरे का रंग उड़ गया था. उसी रात मैं ने मांजी और आप की बातें सुन ली थीं. उसी दिन मुझे पता चला था कि विनय पिता नहीं बन सकता था. यह आप दोनों जानते थे. मेरे लिए यह बात चौंका देने वाली थी और आप दोनों की बातों से मुझे पता चल गया था कि क्या हुआ था. आप रोरो कर मांजी से माफी मांग रहे थे और अपने इस कृत्य पर शर्मिंदा थे. मांजी आप को खूब डांट रही थीं, मैं ने यह उसी समय महसूस कर लिया था कि आप अपनी इस गलती पर बहुत पछता रहे हैं और बहुत शर्मिंदा हैं.

‘‘मैं ने उस समय अपने को ठगा सा महसूस किया था. अपनेआप को कैसे संभाला, यह नहीं बता पाऊंगी. आप का पछतावा और शर्मिंदगी देख कर आप को माफ करने की ठान ली और अगर यह दुर्घटना न हुई होती तो इस बात को मैं भी मन में ही रखती. अब यह बात आप भी भूलने की कोशिश कीजिए,’’ कह कर रेखा ने अजय के कंधे पर हाथ रखा तो उस के दिल पर सालों पुराना रखा बोझ हट गया. यह सच था कि अजय अपनेआप को आज तक माफ नहीं कर पाया था. उसे लगा, रेखा ने सच के उस विष को पी लिया था और उसे पछतावे के भंवर से उबार लिया था. दोनों ने एकदूसरे के चेहरे पर छाए प्यार और विश्वास के संबल को अपनी मुट्ठी में बांध लिया था. अचानक रेखा को कुछ याद आया, बोली, ‘‘और हां, विनय के सामने हमेशा स्वयं को सामान्य रखना. उस ने अपने को पता नहीं कैसे संभाला होगा. आज विनय और कविता पूरी तरह एकदूसरे को समर्पित हैं. उन के रिश्ते में कोई दरार नहीं आनी चाहिए. और दिव्यांशु, उसे तो आप ने पहली बार देखा है, वह भी इस दुर्घटना का शिकार होने पर. बस, अब तक जैसा चल रहा था वैसा चलते रहना चाहिए.’’

अजय ने ‘ठीक है’ कह कर हामी भरी.

रेखा ने कहा, ‘‘अब चलें, हमें इस समय सब के पास होना चाहिए.’’

वह अजय का हाथ पकड़ कर दिव्यांशु के वार्ड की ओर बढ़ गई. और अजय मन ही मन अपनी पत्नी के बड़प्पन के आगे नतमस्तक हो गया.