भारत के दक्षिणी भाग को दक्षिण भारत भी कहते हैं. अपनी संस्कृति, इतिहास तथा प्रजातीय मूल की भिन्नता के कारण यह शेष भारत से अलग पहचान बना चुका है. इतना भिन्न हो कर भी यह भारत की विविधता का एक अंगमात्र है. लिहाजा, यहां पर्यटन के इतने अनोखे ठिकाने हैं कि सैलानी एक बार में दक्षिण भारत के सभी टूरिज्म स्पौट्स कवर कर ही नहीं पाते. आइए, इस साउथ इंडियन पैकेज के जरिए करें दक्षिण भारत के कुछ चुनिंदा पर्यटन स्थलों की मजेदार सैर.

मुन्नार

मुन्नार का स्थान केरल की प्रसिद्धि में बड़ा योगदान देने वाले पर्यटन स्थलों में अव्वल है. यह हिल स्टेशन एक समय दक्षिण भारत के पूर्व ब्रिटिश प्रशासन का ग्रीष्मकालीन रिजौर्ट हुआ करता था. खूबसूरत चाय के बागान, हरीभरी घाटियां, सुहाना मौसम, ऊंचीऊंची चोटियां, अभयारण्य, प्राकृतिक खुशबू से भरी हवा के अलावा वह सबकुछ है जो सैलानियों को यहां खींच लाने के लिए काफी है. यहां की कलकल करती झीलें और घने जंगल देख कर प्रकृति के सर्वोत्तम रूप का नजारा हो जाता है. यहां नीलकुरंजी नामक दुर्लभ फूल  पाया जाता है जो पूरी पहाड़ी को नीला कर देता है. यह 12 वर्षो में केवल एक बार ही खिलता है.  ऐसे ही खूबसूरत नजारों और चौंकाने वाले प्राकृतिक उपहारों से लबरेज मुन्नार आना हर सैलानी का सपना होता है.

दिलचस्प माट्टूपेट्टी

समुद्रतल से लगभग 1,700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित माट्टूपेट्टी मुन्नार से करीब 13 किलोमीटर दूर स्थित है. इस जगह की खासीयतों में स्टोरेज मेसनरी बांध और खूबसूरत झील सब से ज्यादा चर्चित हैं. नीले पानी से लहलहाती इस झील में पर्यटकों के लिए जहां आनंददायक नौकाविहार की सुविधा है वहीं बांध में ठहरा विशाल जल देख कर प्रकृति और तकनीक के अनोखे संगम के दीदार होते हैं. इस जगह की पौपुलैरिटी का क्रैडिट इंडोस्विस लाइवस्टौक परियोजना द्वारा संचालित डेयरी फार्म को भी जाता है. हरेभरे चाय के बागान, ऊंचेनीचे घास के मैदान और शोला वन के साथसाथ माट्टूपेट्टी ट्रैकिंग के लिए आदर्श स्थल है. यहां आ कर सैलानी केरल के हरभरे मिजाज को दिल में सहेज कर लौटते?हैं.

पल्लिवासल, चिन्नकनाल और अनरियरंगल

मुन्नार में प्रवेश करते ही कई पर्यटक उत्सुकतावश पल्लिवासल, चिन्नकनाल और अनरियरंगल की तिकड़ी का जिक्र कर ही देते हैं. वजह, ये तीनों ही ठिकाने सब के पसंदीदा जो हैं. पल्लिवासल मुन्नार के चितिरपुरम से लगभग 13 किलोमीटर दूर स्थित है. यह केरल का पहला हाइड्रोइलैक्ट्रिक परियोजना स्थल है. टूरिस्टों का फेवरेट पिकनिक स्पौट बन चुका यह स्थल व्यापक प्राकृतिक नजारों से भरा पड़ा है. वहीं चिन्नकनाल के झरने, जिसे आमतौर पर पावर हाउस वाटरफौल कहा जाता है, खड़ी चट्टान पर समुद्रतल से 2 हजार मीटर की ऊंचाई से गिरते हैं तो पर्यटकों की आंखें एकटक देखती रह जाती हैं. चिन्नकनाल से लगभग 7 किलोमीटर आगे बढ़ने पर आप अनरियरंगल पहुंच जाएंगे. यह जगह चाय के हरेभरे पौधों का गलीचा है. शानदार जलाशय की सैर एक अविस्मरणीय अनुभव है. अनरियंगल बांध चारों ओर से चाय के बगीचों व सदाबहार वन से घिरा है.

चाय बागान और राष्ट्रीय उद्यान

मुन्नार की अन्य खूबियों में चाय बागान और राष्ट्रीय उद्यान का जिक्र न हो, ऐसा कैसे हो सकता है. ये दोनों ही नेमतें प्रकृति से उपहारस्वरूप मिलती हैं. चाय बागानों को तो मुन्नार की अपनी अलग विरासत माना  जाता है. इस विरासत को सब तक पहुंचाने के लिए केरल की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं में चाय बागानों की उत्पत्ति और विकास के कुछ सूक्ष्म और दिलचस्प पहलुओं को सुरक्षित रखने व प्रदर्शनीय बनाने के लिए मुन्नार में टाटा टी द्वारा कुछ वर्ष पहले एक संग्रहालय की स्थापना की गई. यहां आ कर चाय बागान के विविध आयामों से गहराई से वाबस्ता होने का मौका मिलता है.

इस चाय संग्रहालय में दुर्लभ कलाकृतियां, चित्र और मशीनें रखी गई हैं. यह संग्रहालय टाटा टी के नल्लथन्नी एस्टेट का एक दर्शनीय स्थल है. इसी तरह मुन्नार से 15 किलोमीटर दूर स्थित इरविकुलम राष्ट्रीय उद्यान भी मुन्नार के प्रमुख आकर्षणों में पहली कतार पर आता है. 197 वर्ग किलोमीटर में फैला यह उद्यान तितलियों, जानवरों और पक्षियों की अनेक दुर्लभ प्रजातियों का ठिकाना है. यहां ट्रैकिंग का भी माकूल इंतजाम है. लहरदार पर्वतों पर धुंध की चादर का नजारा देख कर आप को एकबारगी अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं आएगा. 

रोमांच की सौगात : मुन्नार शहर के नजदीक झरने, झील और पहाड़ी सैलानियों को कभी न भूलने वाले रोमांच की नई दुनिया में ले जाते हैं. पावरहाउस वाटरफौल्स तो रोमांच के शौकीन पर्यटकों का पसंदीदा ठौर है. इस के अलावा मुन्नार के प्रमुख आकर्षणों में पोत्त नमेड, आट्टुकल, राजामाला, ईकोपौइंट, मीनूली और नादूकानी हैं जो अपने अंदर पर्यटन का एक अलहदा संसार समेटे हैं.

कब जाएं

मुन्नार की पर्वतमालाएं सुखद मौसम वाली हैं जहां पर्यटक सालभर भ्रमण के लिए आ सकते हैं.

कैसे पहुंचें

मुन्नार पहुंचने के लिए आप हवाईमार्ग, रेलमार्ग या सड़कमार्ग तीनों का इस्तेमाल कर सकते हैं. कोच्चि अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा मुन्नार के लिए सब से नजदीकी हवाई अड्डा है. नजदीकी रेलवे स्टेशन तमिलनाडु का थेनी है जो मुन्नार से 60 किलोमीटर की दूरी पर है.

ऊटी

दक्षिण भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में ऊटी का नाम सब से ऊपर आता है. यहां की मनोहारी सीनरी आप ने ज्यादातर हिंदी फिल्मों के दृश्यांकन में देखी होगी. यही वजह है कि नवविवाहितों के घूमने के लिए ऊटी पहला विकल्प होता है. नीलगिरि की सुंदर पहाडि़यों में स्थित यह शहर आधिकारिक तौर पर उटकमंड कहा जाता है लेकिन संक्षिप्त तौर पर इसे ऊटी कहते हैं. कहा जाता है कि इस का नाम यहां की घाटियों में 12 वर्ष में एक बार फूलने वाले कुरुंजी फूलों के कारण पड़ा. ये फूल नीले रंग के होते हैं तथा जब ये फूल खिलते हैं तो घाटियों को नीले रंग में रंग देते हैं. विशेष यह है कि औफ सीजन में भी यहां का प्राकृतिक सौंदर्य अलग ही सुरम्यता व आकर्षण बिखेरता है. ऊटी से बहुत सी ऐतिहासिक कथाएं भी जुड़ी हैं. चारों ओर फैली हरियाली, देशीविदेशी पेड़पौधे सैलानियों को मुग्ध कर देते हैं.

ऐतिहासिक महत्त्व : इस शहर में ब्रिटिश संस्कृति तथा वास्तुकला का प्रभाव दिखता है. कहते हैं कि अंगरेज यहां की आबोहवा से इतने प्रभावित हुए कि वे ऊटी को टी क्वीन औफ हिल स्टेशंस कहते थे. उन्होंने ऊटी के निकट स्थित वेलिंगटन शहर में मद्रास रेजीमैंट की स्थापना की. उस दिन से वेलिंगटन मद्रास रेजीमैंट का केंद्र बना हुआ है. कला और इमारतों की वास्तुकला, घरों के डिजाइन और निर्माण की शैली सभीकुछ ब्रिटिशकाल से मिलतीजुलती है.

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने ऊटी का विकास भी किया तथा यहां नीलगिरि में चाय, सागौन और सिनकोना का उत्पादन प्रारंभ किया. ऊटी में तथा इस के आसपास चाय और कौफी के अनेक बागान हैं. ऊटी भारत का एकमात्र मीटर गेज पहाड़ीरेलमार्ग है. मद्रास के तत्कालीन राज्यपाल लौर्ड वैनलौक की देखरेख में स्विस तकनीक द्वारा इस रेलमार्ग का निर्माण कराया गया था. दक्कन में दोड्डाबेट्टा सब से ऊंची चोटी है जिस की ऊंचाई 8 हजार फुट है. दोड्डाबेट्टा ऊटी से 10 किलोमीटर दूर है.

ऊटी झील

ऊटी झील को देखना अनोखा और सुखद अनुभव है. झील को घेरे रंगबिरंगे फूल इस की खूबसूरती को नया रंग देते हैं. मनोरम दृश्य के अलावा यहां और भी कई विकल्प हैं जो पर्यटक को यहीं का हो जाने को मजबूर कर देते हैं. मसलन, झील में मोटरबोट, पैडलबोट और रोबोट्स में बोटिंग का लुत्फ भी उठाया जा सकता है. 2.5 किलोमीटर लंबी इस झील में फिशिंग का आनंद भी उठा सकते हैं.

बोटैनिकल गार्डन

22 एकड़ में फैले इस गार्डन में प्रकृति से स्नेह रखने वालों के लिए बहुतकुछ है. 650 दुर्लभ किस्म के पेड़पौधों के साथसाथ अद्भुत और्किड, रंगबिरंगे लिली, खूबसूरत झाडि़यां व 2 हजार साल पुराने पेड़ का अवशेष यहां की विशेषता है. इस की स्थापना 1847 में की गई थी. इस खूबसूरत बाग में एक पेड़ के जीवाश्म संभाल कर रखे गए हैं जिस के बारे में माना जाता है कि यह 20 मिलियन वर्ष पुराना है.

कालहट्टी जलप्रपात

झील की तरह कालहट्टी जलप्रपात भी ऊटी आने का खूबसूरत बहाना है. लगभग 100 फुट ऊंचा यह प्रपात सौंदर्य से भरा पड़ा है. यहां विभिन्न प्रकार के पर्वतीय पक्षियों को देख कर मन उल्लास से भर जाता है. प्रपात पहुंचने के लिए ऊटी से केवल 13 किलोमीटर का सफर करना पड़ता है. झरने के अलावा कालहट्टीमसिनागुडी की ढलानों पर जानवरों की अनेक प्रजातियां भी देखी जा सकती हैं, जिन में चीते, सांभर और जंगली भैंसा शामिल हैं.

रोज गार्डन

ऊटी का रोज गार्डन बहुत खूबसूरत है. इस गार्डन की स्थापना 1995 में की गई थी. यह उद्यान 10 एकड़ में फैला हुआ है. रोज गार्डन में लगभग 200 प्रकार के गुलाब के फूलों का संग्रह है. इस गार्डन को दक्षिण एशिया का सब से उत्कृष्ट गार्डन का पुरस्कार मिला है.

डौल्फिंस नोज और डोड्डाबेट्टा

डोड्डाबेट्टा ऊटी से मात्र 8 किलोमीटर दूर स्थित है. वहीं डौल्फिंस नोज ऊटी से बेहद नजदीक है. दोनों ही जगह प्रकृति  के दिलचस्प नजारे पेश करते हैं. डोड्डाबेट्टा नीलगिरि का सब से ऊंचा पर्वत है. यहां से पूरे इलाके की खूबसूरती के दीदार बड़े आराम से हो जाते हैं. जब मौसम साफ होता है तब यहां से दूर के इलाके भी दिखाई देते हैं जिन में कोयंबटूर के मैदानी इलाके भी शामिल हैं. इस के अलावा डौल्फिंस नोज एक खूबसूरत पिकनिक स्पौट है. यहां से कोटागिरी के कैथरज फौल्स का नजारा भी देखा जा सकता है. यहां बच्चों के साथ पिकनिक का अपना ही मजा है.

वाइल्ड लाइफ सैंक्चुरी

एक तरफ ऊटी में जहां झील और हिल्स जैसे शांत व रमणीय इलाके हैं वहीं वाइल्ड लाइफ सैंक्चुरी के भी मजेदार विकल्प हैं. ऊटी से 67 किलोमीटर दूर स्थित वाइल्ड लाइफ सैंक्चुरी में वनस्पति और जंतुओं की कुछ दुर्लभ प्रजातियां और  हाथी, सांभर, चीतल, हिरन आसानी से देखे जा सकते हैं. यहां उड़ते रंगबिरंगे पक्षी और थेप्पाक्कडु हाथी कैंप सैलानियों का दिल जीत लेते हैं.

जायका खाने का : ऊटी में चाइनीज रेस्टोरैंट काफी हैं. सब से मशहूर है नीलगिरि पुस्तकालय के पास स्थित शिंकोज. वहीं दक्षिण भारतीय भोजन के लिए पर्यटक कुरिंजी का रुख करते हैं. यह शहर चाय, हाथ से बनी चौकलेट, खुशबूदार तेल और मसालों के लिए प्रसिद्ध है. कमर्शियल रोड पर हाथ से बनी चौकलेट कई तरह के स्वादों में मिल जाएगी.

खरीदारी : हौस्पिटल रोड की किंगस्टार कन्फैक्शनरी हाथ से बनी चौकलेट के लिए प्रसिद्ध है. कमर्शियल रोड की बिग शौप से विभिन्न आकार और डिजाइन के गहने खरीदे जा सकते हैं. यहां के कारीगर पारंपरिक तोड़ा शैली के चांदी के गहनों को सोने में बना देते हैं. तमिलनाडु सरकार के हस्तशिल्प केंद्र पुंपुहार में बड़ी संख्या में लोग हस्तशिल्प से बने सामान की खरीदारी करने आते हैं.

कैसे पहुंचें

ऊटी आने के लिए निकटतम हवाई अड्डा कोयंबटूर है. यहां से बस, रेल और कार द्वारा ऊटी पहुंचा जा सकता है. ऊटी रेलमार्ग से भी जाया जा सकता है. यदि यहां बस से आना चाहें तो कोयंबटूर, मैसूर, बेंगलुरु और आसपास के दूसरे शहरों से बस सेवाएं भी उपलब्ध हैं.

कब जाएं

यहां का मौसम पूरे वर्ष खुशनुमा रहता है, हालांकि ठंड में दक्षिण भारत के अन्य भागों की तुलना में यहां का मौसम अधिक ठंडा होता है.

पुडुचेरी

अगर आप सोचते हैं कि बीच के नाम पर भारत में सिर्फ गोआ ही अच्छी जगह है तो आप गलतफहमी में हैं और आप की गलतफहमी पुडुचेरी आते ही दूर हो जाएगी. इसलिए अगर आप भी सैरसपाटे के लिए समुद्रतट जाने की योजना बना रहे हों तो पुडुचेरी जरूर आ कर देखिए. सांस्कृतिक विविधता के दिलकश नजारे तो हैं ही, साथ में विदेशी शासन के समय की जीवनशैली का प्रभाव देखना भी विंटेज इफैक्ट देता है. शांत और सुकून भरे पर्यटन स्थलों की चाह रखने वालों के लिए यह जगह अद्भुत है. पूर्वी तट पर तमिलनाडु से मिला हुआ पुडुचेरी आप को पर्यटन का हर वह सुखांत अनुभव देगा जो आप जीवनभर अपनी यादों में सहेज कर रख सकते हैं. तो चलिए सागर तट का और साथ में विभिन्न सांस्कृतिक धरोहरों का आनंद लेने के लिए बनाइए पुडुचेरी जाने की योजना.

ऐतिहासिक महत्त्व : पुडुचेरी पहले फ्रांसीसी शासन के अधीन था. सितंबर 2006 से इस का नाम पांडिचेरी से बदल कर पुडुचेरी कर दिया गया है जिस का तमिल भाषा में अर्थ है नया गांव. इस की सब से ज्यादा चर्चा लंबे समय तक फ्रांसीसी कालोनी के रूप में रहने और महर्षि अरविंद द्वारा स्थापित आश्रम के कारण है. स्थापत्य कला और संस्कृति की दृष्टि से यह बेहद धनी जगह है. पुडुचेरी पर पुर्तगाल, नीदरलैंड और रोमन शासन भी रहा. वर्ष 1670 में यहां फ्रांसीसी आ गए थे और 1816 में पुडुचेरी पर फ्रांस का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हुआ. फ्रांसीसी शासन में डुप्ले पहला गवर्नर था. आज भी पुडुचेरी में डुप्ले की मूर्ति फ्रांसीसी शासन की याद दिलाती है, हालांकि फ्रांस का असर केवल डुप्ले की प्रतिमा से नहीं, बल्कि पुडुचेरी के समूचे रहनसहन पर नजर आता है. उस की संरचना ही फ्रांसीसी स्थापत्य कला के आधार पर की गई थी.

सड़कें और गलियां समानांतर हैं और सारी गलियां 90 डिगरी के कोण पर मिलती हैं. भारत 1947 में आजाद हुआ पर पुडुचेरी को 1 नवंबर, 1954 को आजादी मिली. लगभग 300 वर्ष तक फ्रांसीसी शासन के अधीन रहने के कारण यहां तमिल, तेलुगू व मलयालम के साथसाथ फ्रांसीसी भाषा न केवल प्रचलन में है बल्कि इसे सरकारी भाषा के रूप में मान्यता भी मिली हुई है.

फ्रैंच परंपरा आरोविले

हर सैलानी को जो जगह सब से ज्यादा भाती है वह है आरोविले. फ्रैंच क्वाटर्स, भोजन, परंपरा और फ्रैंच कालोनी यहां के प्रमुख आकर्षण हैं. आप यहां विश्व स्तर के कई समुद्रतटों का आनंद उठा सकते हैं. अगर आप को धूप व पानी पसंद हैं तो आप यहां जी भर मस्ती कर सकते हैं. यहां के समुद्रतट बहुत शांत और खूबसूरत हैं. यहां के बीच पर कई पेड़ एक लाइन में हैं. इस के अलावा यहां कई स्मारक हैं जो आप देख सकते हैं, जैसे चर्च, औपनिवेशिक इमारतें और प्राचीनकाल के मंदिर, बोटैनिकल गार्डन,  संग्रहालय आदि.

पुडुचेरी बीच

कहते हैं कि पुडुचेरी बीच किसी समय में यहां का प्रमुख आकर्षण था. लेकिन अरियानकुप्पम सागर में एक नए बंदरगाह के निर्माण के कारण होने वाली सामुद्रिक हलचल इस सुंदर बीच के विनाश का कारण बनी. फिलहाल बीच के अवशेष के रूप में सिर्फ रिपरैप शिलाखंड की समुद्री दीवार बची है जो ऐतिहासिक तौर पर देखने वाली जगह है.

बहरहाल, इस के ऊपर एक लाफोक्स प्लेस नाम का आर्टिफिशियल तट बनाया गया है. इस का शाब्दिक अर्थ है नकली बीच. शाम के समय तट पर ट्रैफिक की आवाजाही बंद कर दी जाती है जिस से समुद्र के किनारे टहलने के लिए यह एक आदर्श जगह बन जाती है.

और भी है बहुतकुछ : यहां आ कर लगता है मानो देश के बाहर किसी सुनियोजित, सुव्यवस्थित और साफसुथरे शहर में आ गए हैं. सैंट लुई स्ट्रीट, फैंकोसमार्टिन स्ट्रीट, रोमा रोलां स्ट्रीट, विक्टर सिमोनेल स्ट्रीट आदि खाने और खरीदारी के लिए पर्यटकों को खासे भाते हैं. बीच रोड के अंतिम छोर पर गांधी मंडपम है जहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा है, जो नक्काशी वाली छतरी और स्तंभों से घिरी है. 1826 में स्थापित पुराना बोटैनिकल गार्डन भी खूबसूरत स्थान है. इस का मुख्यगेट नक्काशीदार फ्रांसीसी शैली में है. इस में 1,500 पौधों की प्रजातियां हैं. गार्डन में म्यूजिकल फाउंटेन का आनंद लेना न भूलें.

कैसे पहुंचें

सब से आसान रास्ता ट्रेन या हवाई जहाज से चेन्नई पहुंच कर वहां से बस या टैक्सी से पुडुचेरी पहुंचने का है. आप बेंगलुरु या मदुरै होते हुए भी पुडुचेरी आ सकते हैं. पुडुचेरी के लिए चैन्नई से सीधी और नियमित ट्रेनें हैं.

कब जाएं

यहां दिन गरम होते हैं लेकिन शाम व रातें खुशनुमा होती हैं. ज्यादातर लोग यहां आने के लिए गरमी खत्म होने का इंतजार करते.

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