भारत में दवाइयों के मिश्रणों की बिक्री काफी अनियंत्रित ढंग से हो रही है. मुंबई, पुणे व लंदन के शोधकर्ताओं को ऐसी दवाइयों की बिक्री के प्रमाण मिले हैं जिन्हें केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन की स्वीकृति नहीं मिली है. यह संगठन भारत में औषधियों व चिकित्सा उपकरणों के मानक तय करने वाली संस्था है. शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में 4 औषधि समूहों को शामिल किया था - दर्द निवारक, मधुमेह नियंत्रक, अवसाद की दवाइयां और सायकोसिस की दवाइयां.

अकसर 2-3 दवाइयों को मिला कर मिश्रण तैयार किए जाते हैं जिन्हें फिक्स्ड डोज मिश्रण यानी एफडीसी कहते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक एफडीसी की उत्पादन लागत कम होती है, इन का वितरण आसान होता है और मरीजों के लिए इन का सेवन भी आसान होता है क्योंकि एक ही गोली में 2-3 दवाइयां होती हैं. इस के अलावा मिश्रित एंटीबायोटिक के उपयोग से सूक्ष्मजीवों में प्रतिरोध विकसित होने की संभावना भी कम होती है. अलबत्ता विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस संबंध में भी स्पष्ट दिशानिर्देश तय किए हैं कि किन दवाओं के और किन परिस्थितियों में एफडीसी को बाजार में लाया जा सकता है.

शोधकर्ताओं ने वर्ष 2007 से 2012 के दरम्यान एफडीसी की बिक्री का मुआयना किया. उन्होंने यह भी पता किया कि उपरोक्त प्रत्येक श्रेणी के कितने नुस्खे बाजार में हैं, चाहे केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन की स्वीकृति प्राप्त हो, न हो.

टीम ने यह भी देखा कि उस ने भारतीय बाजार में जिन 175 नुस्खों का अध्ययन किया, उन में से मात्र 14 एफडीसी यूके में और 22 एफडीसी यूएस में स्वीकृत थे. भारत के बाजार में उपलब्ध कई नुस्खे तो अन्य देशों में प्रतिबंधित थे. जैसे, निमेसुलाइड कई देशों में प्रतिबंधित है मगर भारत में यह कम से कम 15 एफडीसी में मिलाया जाता है और इन में से मात्र 1 ही केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन द्वारा स्वीकृत है.

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