डा. अनिता राठौर मंजरी

चार सहेलियां, चारों का अलगअलग धर्म लेकिन दोस्ती चारों में जम कर थी क्योंकि दोस्ती धर्म थोड़े न देखती है. बवाल तो तब खड़ा हुआ जब उन के बच्चों में आंखें चार हुईं. सारा मामला तब उलझ गया.

नोएडा की एक सोसाइटी में 4 सहेलियों को नियमित रूप से सुबहशाम देखा जाता था जिन्हें देख कर वहां के निवासी ‘चार सहेलियां खड़ीखड़ी...’ गीत जरूर गुनगुनाते थे. सर्दीगरमी, धूपकुहरा हो लेकिन वे आती जरूर थीं, बारिश में भी छाता ले कर अपना दोस्ताना निभाती थीं. वे कोई बचपन, स्कूल, कालेज या औफिस की दोस्त नहीं थीं. इसी सोसाइटी में उन की मित्रता ने जन्म लिया था. चारों सुबहशाम सैर करने की शौकीन थीं. इसी शौक ने उन्हें दोस्ती के मजबूत बंधन में बांध दिया था. उम्र के मामले में भी समान थीं लगभग 50 और 55 के बीच की. चारों युवा बच्चों की मां थीं.

 

पहली सहेली राधिका थी जो अपने सासससुर और नोएडा में ही बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत अपने युवा बेटे के साथ रहती थी. उस के पति की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी.

 

दूसरी थी शाहाना जो अपने पति और छोटी बेटी सारा के साथ रहती थी. बड़ी बेटी की शादी हो चुकी थी. तीसरी थी गुरबीर कौर जो अपने पति, सास और बड़े बेटे के साथ रहती थी और जिस का नोएडा में ही मैडिकल स्टोर था और छोटा बेटा पुणे में बीटैक कर रहा था. चौथी थी कैथरीन जिस का अपने पति से तलाक हो गया था और वह अपनी एकलौती बेटी एंजेलिका के साथ रहती थी.

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