लेखिका- शशि ध्यानी      

दादी का भुनभुनाना जारी था, ‘अरे, लड़कियां तो निखालिस भूसा होती हैं, हवा लगते ही फुर्र से उड़ जाएंगी, पर वजनदार अनाज की तरह परिवार का रखवाला तो लड़का ही होता है. बेटे वाले घर की तो बात ही कुछ और है.’

यह सुनने के हम अब आदी हो गए थे. मुझ से 2 बड़ी और 3 छोटी बहनें थीं. मैं तीसरे नंबर की बड़ी चंचल व भावुक थी. मुझ से 2 बड़ी बहनें अकसर गुमसुम रहतीं.

मेरी सब से छोटी बहन का जब जन्म हुआ तो घर में मातम सा छा गया. ऐसा सन्नाटा शायद हम सभी बहनों के जन्म के समय भी रहा होगा. छोटी के जन्म पर पड़ोसी भी ‘हे राम, फिर लड़की ही हुई’ जैसे शब्द बोल कर अपने पड़ोसी होने का धर्म निभा जाते. पापा को 2 लाइन लिख दी जातीं कि इस बार भी घर में बेटी पैदा हुई है.

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छोटी के जन्म के बाद पापा 1 साल में घर आए थे. 2 महीने की छुट्टियां चुटकियों में बीत गईं. वापस ड्यूटी पर जाते हुए पापा ने दादी के पांव छुए. हम सभी लड़कियों को अच्छे नंबरों से पास होने की हिदायत दे कर उन्होंने संकरी पगडंडियों की तरफ धीरेधीरे अपने कदम बढ़ाए तो घुटनेनुमा पहाड़ पर चढ़ते हुए पापा की पदचाप हम सभी महसूस करते रहे.

जितने दिन पापा घर में रहे हर दिन त्योहार की तरह बीता. चूल्हे की आग से तपती कंचनवर्णा मां के चेहरे पर जरा भी शिकन न दिखाई देती. वह बड़ी फुर्ती से पापा की पसंद के व्यंजन बनाती रहतीं. दोपहर के 2-3 बजे पापा गांव से दूर घूमने निकल पड़ते. कभी हम बहनें भी उन के साथ चल देतीं. गोल, चमकीले, चौकोर पत्थरों के ऊपर जब कभी हम सुस्ताने बैठतीं तो पापा भी बैठ जाते. पापा ध्यान दिलाते, ‘देखो बच्चो, कितना सुंदर लग रहा है यह सब. खूबसूरत पहाड़, स्लेटी रंग के पत्थरों से ढकी छतें कितनी प्यारी हैं.’

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