हमारे गांव के पंडित गिरधारी लाल के पास एक मोटी-ताजी दुधारू गाय थी. बिल्कुल झक सफेद रंग, चमकती काया, ऊंचा कद, खूबसूरत सींघें. देखते ही मन रीझ जाता था उस पर. पंडित जी को यह गाय किसी ने दान में दी थी. वे बड़ा प्यार करते थे उससे. सुबह जल्दी उठ कर अपने हाथों से सानी-पानी देते, नहलाते-धुलाते और उसकी रस्सी थामें चराने ले जाते. उस गाय के कारण घर में दूध, घी, दही की कमी नहीं होती थी. खालिस दूध-घी खा-खा कर पंडित जी भी मोटे तगड़े होते जा रहे थे. एक शाम की बात है, पंडित गिरधारी लाल जैसे ही दूध दुहने गोशाला पहुंचे तो गाय वहां से गायब मिली. खूंटा भी उखड़ा हुआ था. पंडित जी की तो जान सूख गयी. उन्होंने सोचा कि हो न हो गाय कहीं निकल भागी है. वह फौरन उसे ढूंढ़ने निकल पड़े.

Tags:
COMMENT