दिसंबर की खामोश सी एक सर्द दोपहर थी. मैं थाना प्रभारी, कोतवाली की हैसियत से कार्यालय के अपने कमरे में कुरसी पर बैठी सरकारी कामों को निबटा कर, फुरसत के क्षणों में अपने पति के साहित्यिक पत्र का जवाब साहित्यिक भाषा में देने का प्रयास कर रही थी. वे लखनऊ विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफैसर थे और उन्होंने मुझ से शिकायत की थी कि पुलिस अधिकारियों में वह दया, ममता नहीं होती जो अन्य विभाग के अधिकारियों, कर्मचारियों में होती है. मैं उन्हें हिंदी भाषा में पत्र लिख कर यह बताना चाहती थी कि पुलिस वाले ऊपर से तो कठोर बने रहते हैं परंतु उन के हृदय में भी दया, ममता, स्नेह और प्यार का सागर हिलोरे लेता है.

Tags:
COMMENT