आदमी पीछे मुड़ कर भी देखता है. सिर्फ आगे देख कर हम आसमान छू तो लेते हैं मगर भूल जाते हैं कि हमारी जड़ें पीछे की तरफ हैं जिन से हम कटते जा रहे हैं. आज का दिन कुछ ऐसा ही था जब प्रदीप का फोन आया. यह मेरे लिए अकल्पनीय था. प्रदीप और मैं भले ही चचेरे भाईबहन हों, प्रदीप की ऊंची हैसियत के चलते उन के परिवार वालों ने हमारे परिवार को कभी तवज्जुह नहीं दी. एक तरह से हम उन के लिए अछूत थे.

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