लहलहाते वृक्ष: भाग 1

अब आगे पढ़ें

आखिरी भाग

सरकार के साधन असंख्य होते हैं. फौरन जिलाधीशों और विकास अधिकारियों की आपातबैठक हुई. निर्देश दिया गया कि सच्चीमुच्ची में वृक्ष लगाए जाएं. इस के और नाना प्रकार के अन्य फंड पहले से ही सब की जेब में हैं, सो, कोई कमी या दिक्कत का बहाना नहीं सुना जाएगा. 15 दिनों बाद दोबारा जांच की जाएगी तब तक किसी न किसी बहाने कमीशन का दौरा अटकाया जाता रहेगा.

अधिकारसंपन्न अधिकारी वापस लौट आए. वे ऐसे आदेशों की अनसुनी करने के अभ्यस्त मगर अपनी खाल बचाने में पारंगत. उन्होंने फौरन तहसीलदारों और खंडविकास अधिकारियों को वृक्षारोपण सुनिश्चित करने के लिखित निर्देश जारी किए और चैन की बंसी बजाने लगे.

मगर अगंभीर सरकार इस बार गंभीर थी. मामला कोर्ट का था न. मुख्य सचिव को अपने अफसरों की ईमानदारी और कर्मठता के बारे में कोई गलतफहमी न थी. इसलिए एक दिन लावलश्कर के साथ खुद जांच के लिए निकल पड़े. जैसा अंदेशा था, बिलकुल वैसा ही हुआ. जिनजिन तहसीलों में छापे मारे वहां के वृक्ष केवल फाइलों में लहलहाते मिले. इतनी हिमाकत. मुख्य सचिव का कहर तहसीलदारों और खंडविकास अधिकारियों की पीठ पर निलंबन का कोड़ा बन बरसने लगा. एकदो जिलाधीश भी उस के लपेटे में आ गए.

पूरे प्रदेश में हंगामा मच गया. सारे तहसीलदारों और अधिकारियों की नींद हराम हो गई. मगर खेलावन बाबू मस्त थे. 15 वर्षों पहले वे पटवारी के रूप में सरकारी सेवा में भरती हुए थे और ‘कड़ी वाली’ मेहनत कर तहसीलदार बन गए थे. इस बीच वे कितने घाटों का पानी पी चुके थे, उन्हें खुद भी याद न होगा.

2 दिनों बाद मुख्य सचिव का लश्कर उन के इलाके में पहुंचा. सचिव से ले कर अपर सचिव तक के अधिकारियों की फौज उन के मुंह से निकले शब्दों को मूर्तरूप देने के लिए साथ में थी.

ये भी पढ़ें- बदलते रिश्ते : रमेश ऐसी कौन सी बात वंदना के बारे में कहना चाहता था ?

‘‘पिछली रिपोर्ट में बताया गया है कि आप के इलाके में वृक्ष नहीं लगाए गए हैं,’’ मुख्य सचिव ने फाइल देखते हुए कहा.

‘‘हुजूर, वृक्ष तो लगाए गए थे लेकिन उन्हें बकरियां खा गई थीं. मगर 15 दिनों में आप के गुलाम ने दोबारा वृक्ष लगवा दिए हैं,’’ खेलावन बाबू ने हाथ जोड़ अपनी कमर को जितना झुका सकते थे उतना झुकाते हुए कहा.

खेलावन बाबू ने दिखाया, मुख्य सचिव और उन की फौज ने देखा. वास्तव में दूरदूर तक लहराते हुए वृक्ष लगे हुए थे. हरेभरे. 4-4, 5-5 फुट के वृक्ष.

‘‘अरे वाह, ये तो बहुत खूबसूरत वृक्ष हैं. बिलकुल हरेभरे,’’ मुख्य सचिव ने सचिव से कहा.

‘‘यस सर, इन वृक्षों की ग्रोथ देख कर लग रहा है 10-15 दिनों में इन में फ्रूट्स भी उग आएंगे,’’ सचिव ने अपनी टाई ठीक करते हुए कहा.

‘‘सर, ये सारे वृक्ष हाइब्रिड के लग रहे हैं. इन में फसल भी बेहतर होनी चाहिए,’’ संयुक्त सचिव, जो शीघ्र ही सचिव बनने वाले थे, ने भी अपना ज्ञान बघारना जरूरी समझा.

‘‘आई थिंक खेलावन बाबू ने इन वृक्षों पर हाई क्वालिटी का इन्सैक्टिसाइड डाला है, तभी बकरियों ने इन्हें नहीं खाया,’’ मुख्य सचिव ने कुछ सोचते हुए कहा.

‘‘यस सर,’’ सचिव ने खोपड़ी हिलाई.

‘‘यू आर राइट सर,’’ संयुक्त सचिव ने अपनी पूरी गरदन हिला डाली. सरकारी सेवा में अधीनस्थों की कार्यकुशलता इन्हीं शब्दों में जाप की मात्रा से नापी जाती है.

मुख्य सचिव ने एक बार फिर अपनी दृष्टि दूरदूर तक लहलहाते

वृक्षों पर डाली. फिर संयुक्त सचिव की ओर मुखरित होते हुए बोले, ‘‘अभी तक हम सब को पनिश करते आ रहे थे, बट आई थिंक, हमें खेलावन को उस के गुड वर्क के लिए अवार्ड देना चाहिए ताकि दूसरों को मोटिवेशन मिल सके.’’

‘‘यस सर’’, ‘‘यू आर राइट सर,’’ सचिव और संयुक्त सचिव ने पूर्ववत अपनीअपनी खोपड़ी और गरदन हिलाई.

‘‘खेलावन, तुम ने 15 दिनों में इतना काम कैसे कर डाला?’’ मुख्य सचिव, खेलावन बाबू से मुखातिब हुए.

‘‘हुजूर, सब आप से प्रेरणा ले कर किया है वरना इस गुलाम में इतनी कूवत कहां,’’ खेलावन बाबू ने एक बार फिर हाथ जोड़ कर अपनी कमर को जितना झुका सकते थे उतना झुकाया.

खेलावन बाबू की मुद्रा देख सचिव का अंतर्मन तृप्त हो गया. खुश हो उन्होंने कहा, ‘‘खेलावन, तुम हमारे वृक्षारोपण अभियान के आईकन हो. हम तुम्हें अवार्ड देंगे.’’

खेलावन बाबू पूरी तरह नतमस्तक हो गए. तृप्त मुख्य सचिव ने इशारा किया तो अपर सचिव ने फौरन अपने ब्रीफकेस से एक लिफाफा निकाला. पुराने अनुभव के चलते वे छपेछपाए सस्पैंशन और्डर के साथसाथ अवार्ड के लिफाफे और एक फोटोग्राफर को भी ले कर मुख्यालय से चले थे.

फोटोग्राफर ने कैमरा संभाला. मुख्य सचिव ने दाता कृष्ण की मुद्रा बनाई और खेलावन बाबू ने सुदामा की मुद्रा में हाथ आगे बढ़ाया.

‘‘तभी हट…हट…हट…’’ करता एक धूलधूसरित 15-16 वर्षीय बालक अपनी बकरियों को हांकते हुए उधर आ गया.

‘‘हटवाओ इन बकरियों को वरना ये वृक्षों को खा जाएंगी और इन्हें उगाने में 15 दिनों की मेहनत बेकार हो जाएगी,’’ मुख्य सचिव ने हाथ रोक कर सचिव को आदेश दिया.

इस से पहले कि सचिव महोदय कुछ कह पाते, उस बालक ने ढीठ की तरह कमर पर हाथ रखते हुए मुख्य सचिव से पूछा, ‘‘बाबू, आप लोग शहर से आए हो?’’

‘‘हां.’’

‘‘तभी ऐसी बातें कर रहे हो,’’ बालक खिलखिला कर हंस पड़ा.

‘‘कैसी बातें?’’ मुख्य सचिव ने आंखें तरेरीं.

‘‘पहली बात, बकरियां खाती नहीं, चरती हैं. और दूसरी बात, वृक्ष 15 दिनों में नहीं, बल्कि 15 साल में तैयार होते हैं,’’ बालक के चेहरे पर व्यंग्यभरी मुसकान तैर गई.

मुसकान देख मुख्य सचिव तिलमिला गए. उन्होंने डपटते हुए कहा, ‘‘तू पूरा मूर्ख है क्या? तुझे ये वृक्ष दिखलाई नहीं देते?’’

वह बालक अपने गांव का राजकुमार सा था. उसी की धरती पर कोई बाहर वाला उसे मूर्ख कहे, यह बात बरदाश्त से बाहर थी. वह ताव खा गया, ‘‘मूरख हो तुम. पक्के पढ़ेलिखे मूरख, जिसे वृक्ष और ताजा खोद कर गाढ़ी गई डाल में फर्क करने की तमीज नहीं है.’’

ये भी पढ़ें- माफी: तलाक के बाद भी प्रमोद ने शिफाली से क्यों मांगी माफी

मुख्य सचिव अवाक रह गए. उन्हीं के सूबे में उन के अफसरों के सामने कोई उन्हें मूर्ख कह सकता है, यह बात कल्पना से भी परे थी. उन की समझ में ही नहीं आया कि क्या कहें.

वक्त की नजाकत समझ उन की तरफ से मोरचा संभालते हुए खेलावन बाबू ने बालक को डपटा, ‘‘चलो, भागो यहां से. साहब लोग वृक्षों की जांच करने आए हैं. उन्हें जांच करने दो. सरकारी काम में बाधा मत डालो वरना अंदर कर दिए जाओगे.’’

पहले मूर्ख कहा और अब अंदर करने की धमकी. बालक का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा और वह हाथ नचाते हुए बोला, ‘‘जांच करने आए हैं तो कायदे से जांचें. झूठमूठ की फोटो क्यों खिंचवा रहे हैं?’’

इतना कह कर वह एक वृक्ष के करीब पहुंचा और बोला, ‘‘अगर ये वृक्ष हैं तो इन की जड़ें भी होंगी.’’

खेलावन बाबू खतरा भांप गए थे मगर इस से पहले कि वे कूद कर उस उद्दंड बालक को दबोच पाते, उस ने अपनी नन्ही भुजाओं से कई वृक्षें को उखाड़ डाला.

जड़विहीन वृक्षों ने सब को जड़ से हिला दिया. खेलावन बाबू तो पूरी तरह सनाका खा गए. अब तो नौकरी जाने की पक्की गारंटी. उन की टांगें कांपने लगीं. नीचे गिरने से पहले उन्होंने भयभीत नजरों से मुख्य सचिव की ओर देखा. वहां मंदमंद मुसकराहट छाई हुई थी.

समस्या का हल उन्हें मिल गया था. अब जहांतहां कमीशन जाएगा, वहांवहां एक दिन पहले ‘खेलावनी विधि’ से लहलहाते वृक्षों का रोपण कर दिया जाएगा. कमीशन के आसपास इस नादान बालक जैसे तत्त्व न भटकने पाएं, यह सुनिश्चित करवाने के उन के पास अनेक साधन थे. वे लावलश्कर के साथ फौरन राजधानी लौट पड़े. बहुत सी तैयारियां जो करनी थीं.

Tags:
COMMENT