शादी में बस चंद दिन ही रह गए थे. पिछली बार जब पूजा अपने मंगेतर राहुल से मिली थी तो दोनों में यह तय हुआ था कि शादी के करीब होने से उन को अब मुलाकातों का सिलसिला रोक देना चाहिए. यह दुनियादारी के लिहाज से ठीक भी था.

इस आपसी फैसले को अभी कुछ ही दिन बीते थे कि पूजा के पास राहुल का फोन आ गया. उस ने कहा, ‘‘पूजा, मैं आप से मिलना चाहता हं. कल शाम को 5 बजे मैं लाबेला कौफी हाउस में आप का इंतजार करूंगा. कुछ ऐसी बातें हैं जो शादी से पहले मेरे लिए आप को बतलाना बहुत जरूरी है.’’

‘‘क्या इन बातों को कहने के लिए शादी तक इंतजार नहीं हो सकता?’’

‘‘नहीं, ऐसी बातें शादी से पहले बतला देना जरूरी होता है.’’

मंगेतर के फोन से बेचैन पूजा को अगले दिन के इंतजार में रात भर नींद नहीं आई. आखिर क्या बतलाना चाहता था वह शादी से पहले उस को? अपने किसी अफेयर के बारे में तो नहीं? अगर इस तरह की कोई बात थी तो पहले की इतनी मुलाकातों में राहुल ने उस को क्यों नहीं बतलाई? अब जबकि शादी की तारीख बिलकुल सिर पर आ गई तो इस तरह की बात उस को बतलाने का क्या तुक और मकसद हो सकता था?

पूजा खुद से ही तरहतरह के सवाल लगातार पूछती रही.

दूसरे दिन शाम को राहुल से मिलने के लिए घर से निकलते वक्त पूजा ने सुषमा भाभी को ही इस बारे में बतलाया. ‘लाबेला’ कौफी हाउस में पूजा पहले भी 2-3 बार राहुल के साथ बैठ चुकी थी. अत: उम्मीद के अनुसार राहुल कौफी हाउस में बाईं तरफ वाले कोने की एक मेज पर बैठा उस के आने का इंतजार कर रहा था.

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