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दिल्ली के डाक्टर, विशेषतौर पर इस अस्पताल के डाक्टरों में सुपीरियरिटी कौंपलैक्स बहुत अधिक था. दूसरे प्रदेश से आए हुए व दूसरी जगह के मैडिकल कालेज से पास हो कर आए डाक्टरों को तो वे सब, डाक्टर ही नहीं समझते थे. खैर, मेरी कैजुअल्टी में नियुक्ति हुई थी और कार्य इतना अधिक था कि बात करने का समय ही नहीं मिलता था. मेरे साथी डाक्टर की नियुक्ति मुझ से कुछ पहले हुई थी और उस ने दिल्ली से ही डाक्टरी डिगरी ली थी, सो, उस में अहं भाव अधिक था. कुछ रोब दिखाने की भी आदत थी.

वैसे भी आयुर्विज्ञान संस्थान की कैजुअल्टी में दम लेने की फुरसत ही कहां थी. ‘सिस्टर, इंजैक्शन बेरालगन लगाना बैड नं. 3 को’  व कभी ‘सिस्टर, 6 नंबर को चैस्ट पेन है, एक पेथीडिन इंजैक्शन हंड्रेड मिलीग्राम लगा देना.’ ‘अरे भई, सिस्टर डिसूजा, जरा इस बच्चे को ड्रिप लगेगी, गैस्ट्रोएंटरिट का मरीज है. जल्दी लाइए ड्रिप का सामान.’ सब ओर हड़बड़ाहट, भागदौड़ और अफरातफरी का माहौल. आकस्मिक दुर्घटनाओं व रोग से ग्रसित रोगी एक के बाद एक चले आते हैं.

‘सुभाष, देखो, ट्राली पर कौन है, अरे भई, यह तो गेस्प कर रहा है, औक्सीजन लगाओ जरा,’ ‘सिस्टर, इंजैक्शन कोरामिन लाना.’

इतने में 8-10 लोग आते हैं एक युवक को उठाए हुए, ‘डाक्टर साहब, देखिए इसे, इस युवक का ऐक्सिडैंट हुआ है. इस की खून की नली से बहुत खून बह रहा है, रोकने के लिए इस ने अंगूठे से दबा रखा है. देखिए, ज्यों ही वह अपना अंगूठा हटाता है दिखाने के लिए, खून का फुहारा मेरे कपड़ों व उस के कपड़ों को भी खराब करता है.’

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