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‘यह बात सच है बेटा.’ ‘नहीं, यह नहीं हो सकता,’ कह कर उस ने छवि की तरफ देखा. छवि की नजरें मिलीं और झुक गईं. ‘इस का मतलब मेरे मातापिता आप दोनों नहीं बल्कि चाचाचाची हैं और आप मेरे ताऊताई हैं.’ ‘नहीं बेटा, हम ही तेरे मातापिता हैं,’ छवि की आवाज भर्रा गई. उस ने रुद्र को अपने से लिपटाना चाहा पर रुद्र उसे झटका दे कर अपने कमरे में चला गया. नीरज और छवि अपनी जगह पर जड़वत खड़े रह गए. ‘अब क्या होगा...’ कहते हुए छवि रो पड़ी और आगे कहा, ‘इसीलिए मैं ने मना किया था.’ वह उस के कमरे की तरफ जाने को तत्पर हो गई. पर नीरज ने रोक लिया. ‘कब तक छवि, एक दिन यह तो होना ही था. उसे थोड़ा सोचनेसमझने का वक्त दो, थोड़ा स्थिर हो जाएगा तब समझाएंगे उसे. अपने जीवन का इतना बड़ा सच जानने के बाद उसे थोड़ा झटका तो लगेगा ही, पर मुझे विश्वास है, सब ठीक हो जाएगा.’ रुद्र्र रात तक कमरे से बाहर नहीं निकला तो रात को छवि उसे खाने के लिए बुलाने गई. रुद्र चुपचाप अपनी स्टडी टेबल पर बैठा हुआ था.

‘चलो बेटा, खाना खा लो,’ वह उस के सिर में हाथ फेरते हुए बोली.

‘मुझे नहीं खाना है,’ कह कर उस ने उस का हाथ झटक दिया. ‘रुद्र, इतना नाराज होना ठीक नहीं बेटा, आखिर ताऊताई या मातापिता में क्या फर्क है. हो तो तुम इसी परिवार के न, हमें तुम कितने प्रिय हो, तुम जानते हो रुद्र...’ ‘जब कोई फर्क नहीं तो आप ने मुझे ताऊताई बन कर ही प्यार क्यों नहीं किया, अपने स्वार्थ के लिए आप ने आज मेरे जीवन में इतना बड़ा भूचाल ला दिया और इतने सालों तक मुझ से इतना बड़ा सच छिपाया,’ कह कर वह एक झटके से उठ कर कमरे से बाहर निकल गया. छवि का हृदय तारतार हो गया. बारबार नियति उस का सबकुछ छीन लेती है. कई दिन गुजर गए. छवि और नीरज ने बहुत कोशिश की पर रुद्र का अबोला न टूटा. तीनों के बीच संवादहीनता की स्थिति आ गई थी. धीरेधीरे नीरज और छवि के सब्र का बांध भी टूटने लगा. एक दिन नीरज ने रुद्र से सीधे ही पूछ लिया, ‘आखिर तुम चाहते क्या हो रुद्र, ऐसा कब तक चलेगा, तुम्हारी पढ़ाई का भी नुकसान हो रहा है ऐसे में.’ ‘मुझे मुंबई जाना है अपने मातापिता के पास, वहीं रह कर पढ़ूंगा.’

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