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आजादी
फैमिली स्टोरीज
आजादी
विदेह को अपनी गलती का एहसास हो गया था, वह लिपट-लिपटकर अपने पिता जी से रोने लगा.
Digital Team
,
Jan 1, 1970
भाग - 1
विदेह के पिता जी उसे सजाने संवारने का कोई मौका नहीं छोड़ते थें.
भाग - 2
बाबूजी के चलते ऐसा अवसर कहां मिल सकता है. कितनी कठिनाई से तो उसे ट्यूशन पढ़ने जाने की अनुमति मिली है.
भाग - 3
विदेह अपनी आजादी की राह ढूंढ़ने के लिए म्ंबई की तरफ निकल रहा था, उसे अंदाजा भी नहीं था कि वह क्या कर रहा है.
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