2 अक्टूबर को देश की राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर दिल्ली पुलिस ने लोकतंत्र की हत्या का लाइव शो दिखाया. पूर्व सीएम आतिशी, नेहा बोरा, योगेंद्र यादव समेत 500 लोगों को बसों में भरकर हिरासत में ले लिया गया. अपराध सिर्फ इतना था कि वे चुनाव आयोग से सवाल पूछ रहे थे कि वोटर लिस्ट से नाम क्यों गायब हो रहे हैं? वो पूछ रहे थे कि SIR के नाम पर पूरे देश में क्या खेल हो रहा है? वे पूछ रहे हैं कि क्या भाजपा अब चुनाव से नहीं, सिर्फ चुनाव आयोग की धांधली के जरिये जीतना चाहती है?

यह तानाशाही का सबसे नंगा रूप है. बीजेपी ने सिर्फ चुनाव आयोग को ही पंगु नहीं बनाया बल्कि लोकतंत्र को ही हाइजेक कर लिया है. यह कैसा लोकतंत्र है जहां गांधी जयंती के दिन गांधी के रास्ते पर चलने वालों को गिरफ्तार किया जाता है? आतिशी एक चुनी हुई नेता हैं. योगेंद्र यादव देश के एक सम्मानित विचारक हैं. नेहा बोरा एक छात्रा नेता हैं. इन्हें इस तरह उठाकर ले जाना तानाशाही नहीं तो और क्या है?

सत्ता को धर्म से नहीं बल्कि तर्क से चलना चाहिए लेकिन यहां सत्ता तर्क से भाग रही है. 500 लोगों किसी अपराधी की तरह डिटेन करने की इस कार्यवाही से साबित होता है कि सरकार के पास जवाब नहीं है सिर्फ डंडा, बसें और बिना वर्दी वाले गुंडे हैं जिनके सहारे यह तानाशाही सरकार हर लोकतान्त्रिक आवाज को कुचल देना चाहती है. इस बर्बरतापूर्ण कार्यवाही के जरिये आज जंतर मंतर खाली करा लिया गया है लेकिन यह सरकार की कामयाबी नहीं है क्योंकि जनता देख रही है और जनता जब जुल्म को सहना बंद कर देती है तब बड़ी से बड़ी तानाशाही सत्ता भी जनता के पैरों तले रौंद दी जाती है.

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