हमारे गांव में दो कुँए थे. एक गाँव के बीचोबीच था. जहाँ गाँवभर की ब्राह्मण, ठाकुर जैसे ऊंची जातियां पानी भरती, नहातीं और कपडे धोतीं और गाँव के आखिरी छोर पर बने दूसरे कुँए को दलित व पिछड़ों के लिए छोड़ दिया गया था. एक दिन खेलखेल में एक दलित बच्चा बड़े कुँए में नहाने आ गया. फिर क्या था. गाँव भर के दबंग और सरपंच ने मिलकर सरेआम उस बच्चे और उस के पिता की जमकर धुनाई की. कई बोरे अनाज का दंड भरवाया सो अलग.

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