देश की गिरती आर्थिक सेहत और रुपए की दुर्दशा पर आंसू बहाने वाली सरकार, जनता और उद्योग जगत को समझना चाहिए कि अर्थव्यवस्था को इस हालत तक पहुंचाने वाले वे खुद ही हैं. वास्तविकता तो यह है कि भारत की कमजोर आर्थिक व्यवस्था हमारी उस संस्कृति का नतीजा है जो सदियों से अकर्मण्यता व निकम्मेपन का संदेश देती रही है. धर्मप्रचारकों का अंधविश्वासी प्रचार, चमत्कार पर निर्भरता और सरकार व जनता का निठल्लापन किस तरह देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ रहा है, बता रहे हैं जगदीश पंवार.

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