खूब ढोल मंजीरे बज रहे थे. बाबा का जयकारा लग रहा था. फूल-मालाओं की बरसात हो रही थी. हुमाद और अगरबत्ती की सुगंध वातावरण में फैल रही थी. गाजे-बाजे बज रहे थे. ललाट पर राख लगाए बाबा धीरे-धीरे भक्तों के बीच चल रहा था. बाबा को देख कर ऐसा लग रहा था मानों वह कोई बड़ी लड़ाई जीत कर लौटा हो. हकीकत में ऐसा नहीं था. बाबा 15 दिनों तक जमीन के अंदर समाधी लगाने के बाद बाहर निकला था और बाबा के अंध्भक्त बौराए हुए ‘बाबा की जय’ के नारे लगा रहे थे. बाबा मुस्कुरा रहा था. शायद वह अपने भक्तों की बेवकूफी और अपनी धूर्तता पर इतरा रहा था.

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