सदियों से धर्म के ठेकेदार भ्रामक प्रचार करते आए हैं कि धर्म से ही समाज और व्यवस्था चलती है. सोचने वाली बात तो यह है कि धर्म ही अगर समाज व व्यवस्था को चला रहा होता तो अदालत, सेना, पुलिस और संसद की जरूरत क्यों पड़ती? सच तो यह है कि धर्म की दुकानों में दंगेफसाद, यौनशोषण और अपराध जैसे कुकर्म पनपते हैं, पढि़ए जगदीश पंवार का लेख.

COMMENT