इसे आदिवासियों की खूबी भी कहा जा सकता है और खामी भी कि वे हर उस आदमी पर भरोसा कर लेते हैं जो कुछ वक्त उनके इलाके में गुजारकर उनके भले की मीठी मीठी बातें करता है, उन्हें कानून और संविधान में लिखे उनके हक दिलाने के वादे करता है और फिर उनके वोट झटककर विधानसभा या लोकसभा में पहुँचकर एशोआराम की ज़िंदगी गुजारते भूल जाता है कि आदिवासी इलाकों में बिजली पानी सड़क और सेहत जैसी बुनियादी सहूलियतों का टोटा है और बाहरी लोग और व्यापारी उसका कैसे कैसे शोषण करते हैं.

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