सतयुग में एक केवट ने राम को नदी पार करा कर एहसान ही किया था लेकिन उस के एवज में शूद्र करार दी गई निषाद जाति का तिरस्कार और प्रताड़ना कलियुग और उस में भी लोकतंत्र की स्थापना तक जारी है. इस का प्रमाण इलाहाबाद हाईकोर्ट में चल रहे दर्जनों मुकदमे हैं जिन का सार यह है कि इस दौर के दबंग भी उन्हें उन के अधिकार के बजाय आशीर्वाद (वह भी सशुल्क) दे कर यह चौपाई गाते रहने की सलाह दे रहे हैं कि, कभीकभी भगवान को भी भक्तों से काम पड़े....यानी गंगा किनारे की रेत और बालू जैसे कीमती आइटमों पर मत्स्यजीवी यह जाति अपना हक न मांगे.

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