पिछले कुछ सालों से जाने क्यों चुनाव आयोग के सर यह भूत सवार हो गया है कि निष्पक्ष चुनाव के साथ साथ उसकी एक महती ज़िम्मेदारी मतदान प्रतिशत बढ़ाने की भी है जिसको निभाने की वह तरह तरह से मतदाताओं से अपील कर रहा है कि कुछ भी हो वोट जरूर डालो. यह जिम्मेदारी अब जुनून में चिंताजनक तरीके से तब्दील हो रही है. तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में वोटिंग प्रतिशत बढ़ाने चुनाव आयोग रंगोली और मेहंदी प्रतियोगिताएं तक आयोजित कर रहा है और तो और हर सरकारी आयोजन में वोट जरूर डालें वाले होर्डिंग और फ़्लेक्स अनिवार्य से हो गए हैं. माहौल शादी वाले घर सरीखा हो गया है जहां सभी एक दूसरे से यह जरूर पूछते हैं कि खाना खाया या नहीं इसमें भी दिलचस्प बात यह कि पूछने वाला जवाब का इंतजार नहीं करता उसका मकसद भी चुनाव आयोग की मुहिम जैसा औपचारिक होता है जिससे शादी में खाने की महत्ता चुनाव में वोट जैसी दिखती रहे.

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