पुराने जमाने की हिन्दी फिल्मों और गुलशन नन्दा छाप सामाजिक उपन्यासों में जब भी नायिका की पवित्रता पर उंगली उठती, तो वह झट से सुबकते हुये कानों को हथेली से ढकते चिर परिचित डायलोग बोल देती थी कि भगवान के लिए ऐसा झूठा इल्जाम मत लगाइए, मैं गंगा की तरह पवित्र हूं, यानि गंगा पवित्रता का पैमाना हुआ करती थी और आज भी पवित्रता के मानक विकल्प के अभाव में है.

राज भाजपा का हो और गंगा शंकर राम वगैरह की दुहाई ना दी जाए तो देश में लोकतन्त्र के होने की गलतफहमी हर किसी को होना स्वभाविक है. हुआ यूं कि गुजरात की मेहसाना रैली में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कुछ ऐसे आरोप मढ़ डाले, जो राजनैतिक चरित्रहीनता की श्रेणी में आते हैं. लिहाजा केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मोदी की तरफ से सफाई दी कि वे गंगा की तरह पाक साफ और पवित्र हैं, उन पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए.

धरम करम की राजनैतिक शैली में मुद्दे की बात आई गई हो गई, जिसके तहत राहुल गांधी के पास एक रहस्यमय डायरी है जिसके खुलासे से भूकम्प आना तय है. ऐसी डायरियां भी पुराने जमाने की ही हिन्दी फिल्मों और जासूसी उपन्यासों की पवित्रता के प्रसंग सरीखी अनिवार्यता हुआ करती थीं, जिनमे कई अहम राज दर्ज रहते थे. अब इस सियासी गैंगवार का सस्पेंस किसी को समझ नहीं आ रहा कि अगर ऐसी कोई डायरी वाकई वजूद में है तो राहुल गांधी उसे गायब होने के पहले सार्वजनिक क्यों नहीं कर देते और नहीं है तो भाजपा गंगा को क्यों बीच में घसीट रही है, जिसके बाबत कांग्रेस प्रवक्ता रंजीत सिंह सुरजेबाला को घिसा घिसाया डायलोग बोलना पड़ा कि गंगा तो कब की यानि राजकपूर के जमाने में ही मैली हो चुकी है.

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