पुराने जमाने की हिन्दी फिल्मों और गुलशन नन्दा छाप सामाजिक उपन्यासों में जब भी नायिका की पवित्रता पर उंगली उठती, तो वह झट से सुबकते हुये कानों को हथेली से ढकते चिर परिचित डायलोग बोल देती थी कि भगवान के लिए ऐसा झूठा इल्जाम मत लगाइए, मैं गंगा की तरह पवित्र हूं, यानि गंगा पवित्रता का पैमाना हुआ करती थी और आज भी पवित्रता के मानक विकल्प के अभाव में है.

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