अखिलेश यादव की गणना कुछ समय पहले तक ऐसे सुसंस्कृत नेता की थी जो पिता का मान सम्मान करता था. सत्ता के 5 सालों ने इस चेहरे को इतना बदल दिया कि वह पिता को जबरन कुर्सी से उतार कर पार्टी को हथिया लिया. मुलायम सिंह लगातार इस बात को कह रहे है कि अखिलेश उनकी नहीं सुनते. अब सरकार और संगठन दोनों अखिलेश के पास हैं. चुनाव चिन्ह की लड़ाई भी वो जीत चुके हैं. इतनी सारी जीत के बाद अगर वह कुछ हारे हैं तो वह उनकी अपनी छवि है. यह बात और है कि पूरी कोशिश इस बात की है कि पिता मुलायम को बुरे लोगों से घिरा दिखा कर अपनी छवि को बचाया जाये. अखिलेश के करीबी लोग मानते हैं कि इस लड़ाई में वह निखर कर सामने आये हैं. राजनीति को जानने परखने वाले लोग समझते हैं कि यह सही आकलन नहीं है. चाटुकारिता में लोग इस तरह की बातें कर रहे हैं.

चुनाव के मैदान में अखिलेश के सामने मुश्किलें अभी बाकी हैं. सबसे अहम लड़ाई सपा के खास यादव बिरादरी को एकजुट करने की है. मुलायम का हताश, निराश और बेबस चेहरा यादव बिरादरी भूल जायेगी, यह संभव नहीं लगता. कोई भी पिता यह नहीं चाहता कि पुत्र इस तरह से सत्ता के लिये पिता को बेबस कर दे. यादव बिरादरी में इस तरह की सोच और भी मजबूत है. मुलायम सिंह यादव के साथ पुरानी पीढ़ी का दिली रिश्ता है. सपा के कुछ वरिष्ठ नेता अपने बेटों के भविष्य के लिये भले ही अखिलेश को सही और मुलायम को गलत कह रहे हों, पर यादव वोट बैंक के लोगों को अखिलेश के साथ ऐसा कोई स्वार्थ नहीं है. वह एक पिता की तरह से सोचते हैं. उनका परिवार में दवाब है. ऐसे में उनकी युवा पीढ़ी अखिलेश के साथ खुलकर खड़ी होगी, ऐसा संभव नहीं लगता है.

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