अखिलेश यादव की गणना कुछ समय पहले तक ऐसे सुसंस्कृत नेता की थी जो पिता का मान सम्मान करता था. सत्ता के 5 सालों ने इस चेहरे को इतना बदल दिया कि वह पिता को जबरन कुर्सी से उतार कर पार्टी को हथिया लिया. मुलायम सिंह लगातार इस बात को कह रहे है कि अखिलेश उनकी नहीं सुनते. अब सरकार और संगठन दोनों अखिलेश के पास हैं. चुनाव चिन्ह की लड़ाई भी वो जीत चुके हैं. इतनी सारी जीत के बाद अगर वह कुछ हारे हैं तो वह उनकी अपनी छवि है. यह बात और है कि पूरी कोशिश इस बात की है कि पिता मुलायम को बुरे लोगों से घिरा दिखा कर अपनी छवि को बचाया जाये. अखिलेश के करीबी लोग मानते हैं कि इस लड़ाई में वह निखर कर सामने आये हैं. राजनीति को जानने परखने वाले लोग समझते हैं कि यह सही आकलन नहीं है. चाटुकारिता में लोग इस तरह की बातें कर रहे हैं.

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