देश में बहुमत से पहली बार  सरकार बनाने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने हिंदू राजाओं जैसा व्यवहार करना शुरू कर दिया. गुजरात में हार्दिक पटेल, हैदराबाद में रोहित वेमुला और दिल्ली में कन्हैया कुमार के साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया वह नई सामाजिक और राजनीतिक बहस की ओर समाज को

ले जा रहा है. देश में भले ही दलितों की बात उठाने वाले नेता कमजोर पड़ रहे हैं या फिर वे हाशिए पर हैं पर अभी भी पूरे देश में बड़ी तादाद में अंबेडकरवाद और उन की विचारधारा से जुडे़ लोग मौजूद हैं. वे केवल मौजूद ही नहीं हैं बल्कि मुखर भी होते जा रहे हैं. देखने वाली बात यह है कि इन को किसी मायावती, रामविलास पासवान और रामदास अठावले जैसे राजनीतिक जमात के लोगों की जरूरत नहीं रही. देश में अंबेडकरवाद इन के लिए ताकत का काम करता है.

भाजपा को दलितों के लिए जिस तरह से काम करना चाहिए था, वह उस ने नहीं किया. भाजपा को लगा कि वह कुछ दलित नेताओं को मंत्री बना कर या संगठन में पद दे कर पूरे समाज पर अपनी छाप छोड़ देगी पर ऐसा सफल नहीं हुआ.

भाजपा ने जिन नेताओं को जोड़ा वे पूरे दलित समाज में पकड़ नहीं रखते थे. क्योंकि पद पाने के बाद ये नेता वैसे ही दलित समाज से दूर हो गए जैसे मायावती 4 बार मुख्यमंत्री बनने के बाद भी अपना प्रभाव उत्तर प्रदेश के बाहर नहीं बढ़ा पाईं. दूसरी तरफ भाजपा अपनी हिंदूवादी नीतियों को ले कर सरकार बनने के बाद ही मुखर हो गई. ‘गो हत्या विवाद’ के बहाने भाजपा ने सोचा था कि इस बहाने वह हिंदू वोटों का धु्रवीकरण कर ले जाएगी. भाजपा को इस बात का एहसास नहीं था कि यह विवाद पार्टी को दलितों से दूर ले जा सकता है. 

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