लेखक- रितु वर्मा

आमतौर पर हम सुनने से ज्यादा बोलने पर यकीन रखते हैं. इसलिए एक अच्छा श्रोता नहीं बन पाते और समस्या ?ोलते हैं. यकीन मानिए अगर आप सुनने को तरजीह देंगे तो आप का मार्ग पहले से साफ होगा. कैसे? जानें. आजकल के डिजिटल युग में हम सब अपने डिजिटल बुलबुलों में ऐसे कैद हैं कि कब रिश्ते हमारे हाथों से फिसल जाते हैं, पता ही नहीं चलता. हम बस, अपनी बात बताना चाहते हैं, अपने विचार दूसरों के समक्ष रखना चाहते हैं चाहे माध्यम फेसबुक हो या ट्विटर. कोई भी डिजिटल माध्यम ऐसा नही है जहां पर सुनने का भी प्रावधान हो.

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