लेखक- रितु वर्मा

आमतौर पर हम सुनने से ज्यादा बोलने पर यकीन रखते हैं. इसलिए एक अच्छा श्रोता नहीं बन पाते और समस्या ?ोलते हैं. यकीन मानिए अगर आप सुनने को तरजीह देंगे तो आप का मार्ग पहले से साफ होगा. कैसे? जानें. आजकल के डिजिटल युग में हम सब अपने डिजिटल बुलबुलों में ऐसे कैद हैं कि कब रिश्ते हमारे हाथों से फिसल जाते हैं, पता ही नहीं चलता. हम बस, अपनी बात बताना चाहते हैं, अपने विचार दूसरों के समक्ष रखना चाहते हैं चाहे माध्यम फेसबुक हो या ट्विटर. कोई भी डिजिटल माध्यम ऐसा नही है जहां पर सुनने का भी प्रावधान हो.

ऋतु जब भी दफ्तर से वापस घर आती थी, उस की बेटी दिया उस से पूरे दिन का लेखाजोखा सुनाने को आतुर रहती थी. ऋतु हर समय मोबाइल को हाथ में लिए दिया की बातों पर बस, कान देती थी, सुनती नहीं थी. धीरेधीरे दिया ने ऋतु से बातें शेयर करनी बंद कर दीं. दिया को लगने लगा था कि मम्मी के पास उस के लिए समय ही नहीं है क्योंकि ऋतु दिया की हर बात पर, बस, प्रतिक्रिया देती थी, बात को सम?ाती नहीं थी. काम्या को ऋषभ का दफ्तर से आने का बेसब्री से इंतजार रहता था. काम्या पूरे दिन का ब्योरा ऋषभ को सुनाना चाहती थी पर ऋषभ मोबाइल या टीवी में खो जाता था. बहुत बार काम्या को लगता कि ऋषभ और वह एक होटल में कमरा शेयर कर रहे हैं.

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ऋषभ की इन्हीं आदतों से तंग आ कर काम्या ने अपने एक्स की तरफ कदम मोड़ लिए जो उस की बातों को तस्सली से सुनता है. किसी भी इंसान का जीवन परफैक्ट नहीं होता. हरेक के जीवन मे उतारचढ़ाव आते रहते हैं. अगर हम किसी समस्या से रूबरू हो रहे हैं तो ऐसे में हमें कोई ऐसा दोस्त चाहिए होता है जो बिना लैक्चर दिए हमारी बात को सुन ले. आज की भागतीदौड़ती जिंदगी में धीरज का बेहद अभाव है. 5जी स्पीड के डेटा की तरह ही हम अपनी बात कहना चाहते हैं और उस के बाद कान बंद कर के अपनी डिजिटल दुनिया में विलीन हो जाते हैं. एक अच्छा श्रोता होना भी एक कला है. यह ऐसी कला है जो हम अपने अंदर थोड़ा सा परिवर्तन कर के आत्मसात कर सकते हैं.

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