50 वर्षीय दीक्षा मिश्रा जब अपना काला कोट पहन कर नागपुर के सैशन कोर्ट में वकालत करती हैं तो लोग उन्हें देखते ही रह जाते हैं. उन्हें अपनी वकालत की डिग्री पूरी किए महज 3 वर्ष हुए हैं. उन्होंने बड़े ही कठिन हालात में अपने पढ़नेलिखने के सपने को पूरा किया.

पुराने दिनों की याद करते हुए दीक्षा कहती हैं, ‘‘मैं शुरू से ही पढ़नेलिखने की शौकीन रही हूं. बचपन से ही वकील बनना चाहती थी, परंतु मात्र 18 वर्ष की आयु में मृत्युशैया पर पड़े पिता की इच्छा का मान रखने के लिए परिवार के सदस्यों ने मेरा विवाह कर दिया और मेरा पढ़लिख कर वकील बनने का सपना 10 लोगों के संयुक्त परिवार की जिम्मेदारियों और बच्चों की परवरिश के तले दब कर रह गया. 5 वर्ष के अंदर ही 3 बेटियों की मां बन गई. 40 वर्ष की उम्र तक तो मैं नानी भी बन गई.

‘‘पति का अपना बिजनैस था. वे उस में व्यस्त रहते. बेटियों की शादी के बाद जीवन में कुछ ठहराव सा आ गया तो मन में अपनी अधूरी पढ़ाई को पूरा करने की इच्छा बलवती होने लगी.

‘‘एक दिन जब अपने मन की बात पति अक्षत को बताई तो वे भड़क गए कि क्या करोगी इस उम्र में पढ़ कर. आराम से घर में रहो जैसे और भाभियां रहती हैं. मांबाबूजी की सेवा करो. पर मेरे न मानने पर वे बोले कि जैसा तुम्हें ठीक लगे करो.

‘‘मगर परिवार के अन्य सदस्यों से अनुमति लेनी अभी बाकी थी. संयुक्त परिवार वाले हमारे घर में सभी की दकियानूसी सोच थी कि लड़की की शिक्षा सिर्फ उस के विवाह के लिए ही होती है. विवाहोपरांत एक महिला का जीवन सिर्फ घरपरिवार के लिए होता है. पर मैं ने हार नहीं मानी और एक दिन उचित अवसर देख कर अपने सासससुर से बोली कि पिताजी, मैं आगे पढ़ना चाहती हूं. यह सुनते ही सास तल्ख स्वर में बोलीं कि दादीनानी की उम्र में पढ़ाई की क्या जरूरत है? क्या करोगी पढ़ कर? ससुर भी असंतुष्ट से स्वर में बोले कि बहू, तुम्हारी बात मेरी तो समझ में नहीं आ रही. आखिर तुम चाहती क्या हो? किस बात की कमी है तुम्हें इस घर में जो आगे पढ़ाई करना चाहती हो? खैर, तुम्हारी मरजी.

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