‘‘आइए स्वामीजी, इधर आसन ग्रहण कीजिए,’’ अशोक ने गेरुए वस्त्रधारी तांत्रिक अवधूतानंद का स्वागतसत्कार करते हुए अपने जीजा की ओर देखा और बोला, ‘‘भाई साहब, यह स्वामीजी हैं और इन को प्रणाम कर आशीर्वाद लीजिए. आप की सभी समस्याओं का समाधान इन की मुट्ठी में कैद है.’’

‘‘प्रणाम, महाराज. अशोक के मुख से आप के चमत्कारों की महिमा सुन कर ही मैं आश्वस्त हो गया था कि आप ही चुनाव रूपी भवसागर में हिचकोले खाती मेरी नैया को पार लगा सकते हैं. आप की जयजयकार हो...आप...’’

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