होली पर रंगों से खेलना पुरानी परंपरा है. मगर अब रंगों का रूप बदल गया है. जहां पहले अबीर, गुलाल, टेसू, केसर आदि रंगों से होली खेली जाती थी वहीं आज पेंट मिले पक्के रंगों से खेली जाती है. ये रंग शारीरिक व मानसिक नजरिए से तो पीड़ादायक होते ही हैं, सौंदर्य की दृष्टि से भी कम नुकसानदायक नहीं होते. होली अकसर 2 तरह के रंगों से खेली जाती है-सूखे रंगों से व गीले रंगों से. सूखे रंग त्वचा को उतना नुकसान नहीं पहुंचाते जितने गीले रंग पहुंचाते हैं. मगर आजकल सूखे रंग भी ऐसे मिलावटी पदार्थों से बनाए जाते हैं जो यदि त्वचा पर ज्यादा देर तक लगे रहें तो त्वचा फट जाती है. स्थायी या अस्थायी तौर पर लाल चकत्ते भी उभर सकते हैं.

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