सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई में सुधार को ले कर जस्टिस लोढ़ा कमेटी की ज्यादातर सिफारिशें मंजूर कर ली हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बीसीसीआई लोढ़ा पैनल की सिफारिशें 6 महीने में लागू करे. अब बोर्ड में मंत्री और अधिकारी शामिल नहीं हो पाएंगे, राजनेताओं पर कोई पाबंदी नहीं है. बीसीसीआई में अब 1 व्यक्ति 1 पद का नियम लागू होगा. खिलाडि़यों का अपना संघ होगा. बीसीसीआई अधिकारियों की उम्रसीमा 70 वर्ष होगी. ओवर के बीच विज्ञापन पर बीसीसीआई ब्रौडकास्टर से बात कर हल निकालेगा. इस के अलावा सट्टेबाजी वैध हो और आरटीआई का दायरा हो, यह संसद पर छोड़ दिया गया.

उम्मीद की जा रही है कि इस से भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई में कुछ पारदर्शिता जरूर आएगी. अदालत ने सिर्फ प्रशासनिक पक्ष पर अपना फैसला दिया है. जाहिर है यदि प्रशासनिक पक्ष सुधरेगा तो बाकी चीजें भी सुधर जाएंगी. लेकिन मोदी सरकार की तरह, यहां भी खुद न बैठ कर अपने करीबी को बैठा दिया जाएगा, ऐसा संभव है.

चूंकि बीसीसीआई के पास अकूत पैसा है और सब से धनी संस्था भी है इसलिए हर राजनेता, उद्योगपति या फिर पहुंच रखने वाला व्यक्ति इस संस्था की ओर ललचाता है, हर कोई इस की मलाई खाना चाहता है. शायद इसीलिए इस संस्था में शुरू से ही राजनेताओं, उद्योगपतियों और पहुंच व पावर रखने वाले लोगों का एकछत्र राज रहा है.

बीसीसीआई में पारदर्शिता, मनमानी और भ्रष्टाचार को ले कर सवाल उठने लगे, बावजूद इस के, जवाबदेही किसी की नहीं. मामला इतना बढ़ गया कि सुप्रीम कोर्ट को इस में दखल देना पड़ा.

यह केवल क्रिकेट की ही बात नहीं है, तकरीबन हर खेल संघों में राजनेताओं या रसूखदारों की घुसपैठ है जो केवल पैसा बनाने या अपने स्वार्थ के कारण खेलों का इस्तेमाल करते हैं. यही वजह है कि लगभग हर खेल की स्थिति दयनीय होती जा रही है. अब खिलाड़ी भी देश के लिए नहीं, बल्कि पैसों के लिए खेलते हैं. इसे यदि गंभीरता से नहीं सोचा गया तो शायद खेल खेल नहीं रहेगा, व्यवसाय बन कर रह जाएगा.    

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