पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने पाकिस्तानी बल्लेबाज अहमद शहजाद और श्रीलंका के खिलाड़ी तिलकरत्ने दिलशान के बीच हुई आपसी बातचीत में धार्मिक टिप्पणी की जांच के लिए एक समिति बनाई है. हुआ यों था कि दंबुला में श्रीलंका और पाकिस्तान के बीच एकदिवसीय मैच चल रहा था. जैसे ही मैच खत्म हुआ तो ड्रैसिंगरूम की ओर लौटते समय अहमद शहजाद ने तिलकरत्ने से कहा कि अगर कोई गैर मुसलिम इसलाम कुबूल कर लेता है तो वह सीधा जन्नत में जाता है. लेकिन इस के जवाब में तिलकरत्ने ने कहा कि नहीं, मुझे अपना धर्म नहीं बदलना है. इस पर शहजाद ने कहा कि तो फिर तैयार रहो आग में जलने के लिए.

बात जांच की नहीं है, सोच की है. अब तक खेलों में राष्ट्र भावना देखी गई है लेकिन शहजाद के इस रवैए से खेलों में धार्मिक कट्टरता की मानसिकता रोपित होती दिख रही है. हर अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी का इस तरह मजहबी दखलंदाजी करना आम जनता को नकारात्मक संदेश भेजेगा. धार्मिक कट्टरता से दुनिया के बड़ेबड़े मुल्क मारकाट के शिकार हुए हैं. सीरिया व इराक इस बात के गवाह हैं जो शहजाद को या फिर दिलशान को अपना रोल मौडल मानते होंगे. भला वे क्या सीखेंगे इन से? अगर खिलाड़ी इस तरह धर्म की पैरवी करने लगे तो न खेल बच पाएगा और न ही खिलाड़ी. आज पिच पर धर्म के नाम पर सिर्फ जिरह हो रही है. कल को लव जिहाद की तर्ज पर खेल जिहाद का गंदा खेल शुरू हो जाए तो आश्चर्य कैसा. दरअसल, तिलकरत्ने दिलशान मुसलमान पिता और बौद्ध मां के बेटे हैं. इस से पहले उन का नाम तुआन मोहम्मद दिलशान था.

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