भारत की महिला बीच कबड्डी टीम ने 5वें एशियाई बीच खेलों में लगातार 5वीं बार खिताब जीता जो मौजूदा खेलों में देश का पहला स्वर्ण पदक है. भारतीय टीम ने थाईलैंड को 41-31 से हराया. वहीं भारतीय पुरुष टीम को फाइनल में पाकिस्तान के हाथों हार का सामना करना पड़ा और रजत पदक से संतोष करना पड़ा. इन खेलों का आयोजन हर 2 साल में किया जाता है.

कबड्डी हमेशा से ही लोकप्रिय और मनोरंजक खेल रहा है, खासकर गांवदेहातों में. सही माने में क्रिकेट जैसी लोकप्रियता कबड्डी को मिलनी चाहिए क्योंकि यह खेल न सिर्फ विशुद्ध भारतीय है बल्कि क्रिकेट से पहले से खेला जाता रहा है. क्रिकेट जहां शहर व उच्च वर्ग की रुचि का नतीजा है वहीं कबड्डी में गांवकसबों व मध्यवर्ग की सक्रियता दिखती है.

जब से महिला कबड्डी चैलेंज की शुरुआत हुई है तब से महिलाओं में भी कबड्डी के प्रति जिज्ञासा बढ़ी है. इस से महिला कबड्डी खेल को एक नई रूपरेखा मिली है. वैसे भी, भारतीय महिला कबड्डी टीम वर्ष 2010 और वर्ष2014 में एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक हासिल कर चुकी है. 2012 और 2013 में हुए विश्वकप खेलों में भारतीय महिला टीम को जीत हासिल हुई थी.

अफसोस बस इतना है कि इतना कुछ करने के बाद भी भारतीय महिला टीम को वह पहचान नहीं मिल पाई जिस की वह हकदार थी. मगर ‘महिला कबड्डी चैलेंज’ के आने से अब धीरेधीरे महिला कबड्डी को पहचान मिलने लगी है. जैसा कि पिछले दिनों महिला कबड्डी चैलेंज की 3 टीमों आईस रिवाज, स्टौर्म क्वींस और फायर बर्ड्स की कप्तानों ने माना था कि जब से महिला कबड्डी चैलेंज की शुरुआत हुई है तब से पहचान मिलने लगी है. हालांकि टीवी चैनल्स को इस में भी व्यापक भूमिका निभाने की आवश्यकता है.

वैसे कबड्डी का खेल इतना आसान भी नहीं है. इस के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से काफी बल का प्रयोग करना पड़ता है, खासकर महिलाओं को अपने बदन को गठीला बनाना पड़ता है. उन्हें छुईमुई वाली छवि से बाहर निकलना पड़ता है, तभी सफलता हाथ लगती है. 

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