क्रिकेट में राजनीति आम बात है, बात चाहे खेल संघों की हो या फिर चयन समिति की. खिलाड़ी अकसर राजनीति के शिकार होते रहे हैं पर कई खिलाड़ी ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने क्रिकेट के मैदान से संन्यास ले कर राजनीति के मैदान में सियासी पारी खेली है. ताजा मिसाल भारतीय टीम के पूर्व क्रिकेटर श्रीसंत हैं जिन्हें भारतीय जनता पार्टी ने केरल के तिरुवनंतपुरम विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतारा है. केरल विधानसभा चुनाव में भाजपा को ज्यादा कुछ नहीं मिलने वाला है. उस की कोशिश यही है कि कम से कम इज्जत बच जाए, इसलिए उस ने खाली बैठे श्रीसंत को उतार कर अपनी साख बचाने की जुगाड़ भिड़ाई है.

मैच फिक्सिंग के मामले में फंसे श्रीसंत पर बीसीसीआई ने क्रिकेट खेलने पर प्रतिबंध लगा रखा है. राजनीति में बड़ा ब्रेक मिलने पर श्रीसंत उत्साहित हैं. श्रीसंत से पहले दर्जनों क्रिकेटर राजनीति में सियासी पारी खेल चुके हैं. मोहम्मद कैफ, मोहम्मद अजहरुद्दीन, कीर्ति आजाद, चेतन चौहान, मनोज प्रभाकर, चेतन शर्मा, विनोद कांबली और युवराज सिंह के पिता योगराज सियासी मैदान में उतर कर कुछ खास नहीं कर पाए. सचिन तेंदुलकर कांगे्रस के टिकट पर राज्यसभा सांसद हैं, पर सचिन ने राजनीति से अपनेआप को फिलहाल दूर रखा है.

खिलाडि़यों को उन की शोहरत की वजह से राजनीतिक पार्टियां मैदान में उतार तो देती हैं पर या तो वे पहली ही पारी में फिसड्डी हो जाते हैं या फिर चुनाव जीत गए तो न तो वे अपने क्षेत्र में दिखाई देते हैं और न ही संसद या विधानसभा में. सिवा नवजोत सिंह सिद्धू के, कोई भी खिलाड़ी लंबी पारी नहीं खेल पाया. हालांकि क्रिकेटर कभी भाजपा को फले नहीं हैं. सिद्धू पंजाब में पार्टी के गले की हड्डी बने हुए हैं तो कीर्ति आजाद बिहार में पार्टीविरोधी बयान दे कर फसाद खड़े करते रहे हैं. श्रीसंत को राजनीति के मैदान में खुद को साबित करना होगा और न भी कर पाए तो उन का नुकसान कुछ नहीं होने वाला है. जो बिगड़ेगा वह भाजपा के खाते में दर्ज होगा.

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