जब से भारत और पाकिस्तान की क्रिकेट टीमें बनी हैं तब से ले कर आज तक इन टीमों  में राजनीति हावी रही है. कभी राजनीतिबाज क्रिकेट के जरिए दोनों मुल्कों के बीच संबंध सुधारने की बात करने लगते हैं तो कभी किसी भारतीय खिलाड़ी द्वारा पाकिस्तानी खिलाड़ी से शादी रचा लेने पर मधुर संबंधों की बात होने लगती है. पर प्रश्न यह उठता है कि क्या इस से दोनों मुल्कों के बीच संबंध सुधर पाएंगे? शायद नहीं, पर राजनेताओं को तो राजनीति करनी है और खेल संघों में राजनेताओं की दखलंदाजी कुछ ज्यादा ही है. इसलिए वे क्रिकेट के जरिए खुल कर राजनीति करते हैं और खिलाड़ी इन के हाथ की कठपुतली बन कर रह जाते हैं.

26 नवंबर, 2008 को मुंबई हमले के बाद दोनों देशों के बीच आरोपप्रत्यारोप का दौर चला और बात क्रिकेट तक पहुंच गई जिस के चलते दोनों देशों के बीच टैस्ट क्रिकेट को ग्रहण लग गया. अब फिर से दोनों देशों के बीच टैस्ट क्रिकेट खेलने की कवायद शुरू हो गई है. दोनों देशों के बीच टैस्ट मैच इंगलैंड में और एकदिवसीय मैच श्रीलंका में हो सकते हैं. पर इस में खिलाड़ी नहीं, राजनेता अपनी पीठ थपथपाएंगे और ढिंढोरा पीटते रहेंगे कि यह तो हमारे प्रधानमंत्री या दूसरे मंत्रियों के प्रयासों के चलते संभव हुआ है जिन्होंने अपनी कूटनीति से भारत और पाकिस्तान के बीच मैच करवा कर ही दम लिया.

भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच किसी युद्ध से कम नहीं होता क्योंकि दर्शकों के दिमाग में कुछ युद्ध जैसा ही माहौल बन जाता है या फिर बना दिया जाता है. खिलाडि़यों की तो बात छोड़ दीजिए, उन पर तो दोनों तरफ से दबाव रहता है. अगर पाकिस्तान के खिलाड़ी हारते हैं तो वहां के दर्शक उन का गालीगलौज से स्वागत करते हैं और ऊपर से पदाधिकारियों व नेताओं की गाज तो उन पर गिरना स्वाभाविक है.

इस मामले में भारतीय खिलाड़ी कुछ राहत महसूस करते हैं क्योंकि यहां दर्शक बहुत ही जल्द सबकुछ भूल जाते हैं. एक मैच में अगर खिलाड़ी खराब प्रदर्शन करे तो मीडिया सहित जनता भी उस खिलाड़ी या भारतीय टीम की आलोचना खूब करती है और जैसे ही दूसरे मैच में भारतीय टीम या खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो उसे सिर पर बैठा लेते हैं.

खेल को राजनीति से दूर रखने की जरूरत है. शिवसैनिकों को भी सोचना चाहिए कि खेल का विरोध करने या पिच खोदने से क्या सीमापार से आतंकवाद खत्म हो जाएगा? या फिर दोनों देशों के खिलाड़ी अगर मैच खेलते हैं तो क्या आपसी रिश्ते सुधर जाएंगे? इसलिए राजनेताओं को खेल में राजनीति छोड़ खेल का और खिलाडि़यों का सम्मान करना चाहिए. खिलाडि़यों को प्रोत्साहित करना चाहिए. खेलों की गुणवत्ता को सुधारने के कदम उठाए जाने चाहिए ताकि खेल बच सकें.

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