भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई को सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर से फटकार लगाई और कहा कि उस के पदाधिकारी खुद सीधे हो जाएं, वरना उसे आदेश के जरिए उन्हें सीधा करना पड़ेगा, बीसीसीआई खुद को कानून के ऊपर न समझे.

सुप्रीम कोर्ट को ऐसा इसलिए कहना पड़ा क्योंकि उस ने कुछ समय पूर्व बीसीसीआई में पारदर्शिता और क्रिकेट में सुधार लाने के लिए जस्टिस आर एस लोढ़ा समिति का गठन किया था. लोढ़ा समिति ने छानबीन कर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी रिपोर्ट सौंप दी. सुप्रीम कोर्ट ने समिति की सिफारिशों को मानते हुए बीसीसीआई को उन पर अमल करने के लिए कहा. लेकिन दुनिया की सब से रईस क्रिकेट संस्था उन सिफारिशों की अनदेखी कर अपनी मनमानी करती रही.

इस बात से नाराज हो कर जस्टिस आर एस लोढ़ा समिति ने सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल कर कहा कि बीसीसीआई हर कदम पर सुधारों को रोकने में लगा हुआ है.

दरअसल, लोढ़ा समिति की सिफारिशों में कहा गया है कि 9 वर्ष से ज्यादा पुराने अधिकारियों को हटाया जाए और 9 वर्ष पुराने अधिकारियों के लिए दोबारा चुनाव न कराए जाएं. एक बार में 3 वर्ष से अधिक पद पर रहना संभव नहीं. 3 बार से ज्यादा कोई भी बीसीसीआई का पद नहीं ले सकता. 70 वर्ष से अधिक उम्र वालों को रिटायर किया जाए.

इस के अलावा कई और ऐसी सिफारिशें की गई हैं जो बीसीसीआई में बैठे पदाधिकारियों को रास नहीं आ रही हैं. वे बौखलाए हुए हैं कि यदि ऐसा हो गया तो सबकुछ उन के हाथ से निकल जाएगा. न पद मिल पाएगा और न ही पैसा. इसलिए ये लोग तिकड़म लगा रहे हैं कि पैसा और पावर की धौंस बनी रहे.

बीसीसीआई के लिए यह बड़े शर्म की बात है कि देश की सर्वोच्च अदालत बीसीसीआई और खेल की भलाई के लिए सुधार की बात कर रहा है और ये सुधरने के बजाय तिकड़मबाजी और धौंसबाजी दिखा रहे हैं. जबकि इस से बीसीसीआई में कामकाज के तरीके भी बदलेंगे और खेल की दशा में भी सुधार आएगा. बीसीसीआई को तो खुद आगे बढ़ कर लोढ़ा समिति की सिफारिशों पर अमल करना चाहिए और सहयोग देना चाहिए. लेकिन वे इसलिए नहीं करना चाहते हैं क्योंकि ऐसा करने से उन के हाथ से सबकुछ निकल जाएगा और वे कहीं के नहीं रहेंगे.

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