अपनी ही शादी में बच्चों की उपस्थिति यानी मातापिता की शादी में बच्चों का शामिल होना कभी समाज के लिए एक मजाक या फिर उलाहने के रूप में देखा जाता था. किसी समय में एक हद तक यह अपमानजनक बात भी हुआ करती थी पर आज के समाज की यह वास्तविकता बन गई है. समाज आज बहुत बदल चुका है. सैलिब्रिटी से ले कर आम कमानेखाने वाले परिवार में भी यह चलन आम होता जा रहा है. दरअसल, रूढि़वादी और दकियानूसी समाज के ढांचे अब टूट रहे हैं. समाज अपने बंधेबंधाए दायरे से बाहर निकल रहा है. जाहिर है, यह समाज में एक सकारात्मक परिवर्तन है.

बदलते समाज में बच्चे अपनी पढ़ाई या फिर नौकरी के सिलसिले में अकसर मातापिता से दूर होते जा रहे हैं. बुढ़ापे में वक्तजरूरत लंबी दूरी को तय कर के समय पर पहुंचना मुमकिन नहीं होता है. किसी इमरजैंसी के समय दूसरे सदस्यों का भी समय पर पहुंचना मुमकिन नहीं होता. इन तमाम व्यावहारिक दिक्कतों के चलते बच्चे अपने मातापिता की शादी करवाने के पक्ष में हैं. हालांकि यह बदलते समाज की कड़वी सचाई है लेकिन यह भी सच है कि कुछ मामलों में बच्चे अपने मातापिता के अकेलेपन को दूर करने की भी चाह रखते हैं.

इस थीम पर कई फिल्में भी हैं

वैसे मातापिता की शादी करवाने की थीम को ले कर कई फिल्में बौलीवुड में बनी हैं. मसलन, ‘कुछकुछ होता है’, ‘गोलमाल 3’, ‘प्यार में ट्वीस्ट’ और ‘मेरे बाप पहले आप’ जैसी फिल्मों की थीम का केंद्रबिंदु बच्चों द्वारा माता या पिता की शादी करवाना ही था. इस विषय पर सब से नायाब फिल्म 1978 में निर्देशक बासु चटर्जी ने बनाई थी. फिल्म का नाम था ‘खट्टामीठा’. 2 परिवारों के एक होने को आधार बना कर यह पारिवारिक कौमेडी दूसरी शादी करने वाले बुजुर्ग दंपती को केंद्र में रख कर बनाई गई. हास्य की चाशनी में लपेट कर बच्चे किस तरह अपने अकेले मातापिता का घर बसाते हैं, फिल्म में बेहद दिलचस्प तरीके से दिखाया गया था.

‘सैकंड मैरिज डौट कौम’ नामक फिल्म बुढ़ापे में शादी के संवेदनशील मुद्दे पर आधारित है. गौरव पंजवानी निर्देशित इस फिल्म में बुजुर्गों की भावनात्मक जरूरतों पर प्रकाश डाला गया है. गौरव पंजवानी ने अपने एक बयान में कहा, ‘‘समाज में पुनर्विवाह एक सामाजिक कलंक माना जाता है, लेकिन अब युवा पीढ़ी की मानसिकता बदल रही है और वे अपने मातापिता की भावनात्मक जरूरतों को समझने लगे हैं.’’ उन्होंने आगे कहा, ‘‘अगर उन के मातापिता स्वयं को प्यार व शादी का दूसरा मौका देना चाहते हैं तो वे इस बात से हिचकिचाते नहीं हैं.’’

हालांकि जहां तक दूसरी शादी का सवाल है तो यह पहले भी समाज में होता था. लेकिन ऐसा जोर परिजन ही डाला करते थे. और पत्नी की मृत्यु के बाद साली से जीजा की शादी करवा दी जाती थी ताकि बच्चों को मां की कमी न खले. लेकिन बच्चों द्वारा मातापिता की शादी करवाने की घटना कम ही देखीसुनी जाती थी.

मैरिज ब्यूरो : एक मदद

मैरिज ब्यूरो ने नया रास्ता खोल दिया है. उत्तर व दक्षिण कोलकाता के विभिन्न मैरिज ब्यूरो में आर्थिक रूप से सक्षम 250-300 बुजुर्गों ने दोबारा शादी करने के लिए रजिस्टे्रशन करवाया है. इन में से ज्यादातर के बच्चे विदेशों में नौकरी करते हैं और वे नहीं चाहते हैं कि उन के मातापिता उम्र के इस पड़ाव में अकेलेपन का दुख सहें.

यह भी सच है कि जब पत्नी की मृत्यु के बाद पिता दूसरी शादी करे या पति की मृत्यु के बाद मां की शादी में बच्चे शामिल हों तो भले ही समाज में कानाफूसी शुरू हो जाए लेकिन जब खास लोगों की बात आती है तो यही समाज कुछ नहीं कहता. कुछ साल पहले सैफ अली खान और करीना के ब्याह में सैफ और अमृता के बच्चे सारा और इब्राहिम शामिल हुए. यहां तक कि केवल शादी में नहीं, बल्कि संगीत और मेहंदी में भी सैफ के दोनों बच्चे बड़े उत्साह के साथ शामिल हुए थे. कुछ ऐसा ही मामला शशि थरूर और सुनंदा का भी रहा है.

इस के पीछे क्या है मनोविज्ञान

कोलकाता के जानेमाने मनोविज्ञानी जयरंजन राम का कहना है कि किसी एक इंसान या समाज में जो कुछ बदलाव आता है, उस के पीछे एक मनोविज्ञान काम करता है. इंसानी फितरत है कि वह अपने जीवन में हमेशा खुशी चाहता है. इस की तलाश में वह बहुतकुछ करता है. वहीं, समाज में बदलाव भी एक हकीकत है और इस के तहत बहुत सारी पुरानी मान्यताएं टूटती हैं और दकियानूसी सोच पर आघात भी लगता है.

बच्चों से दूरी व अकेलापन

शिक्षा व नौकरी के चलते दूसरे शहर व विदेशों में बसे बच्चों को अब अपने अकेलेपन से जूझ रहे बुजुर्ग माता या पिता की दूसरी शादी करने से कोई परहेज नहीं है बल्कि वे खुद चाहते हैं कि उन का घर दोबारा बस जाए. समाजशास्त्री भी मानते हैं कि बड़ी उम्र में अकेलापन डिप्रैशन व कई बीमारियों का कारण बन जाता है. ऐसे में अगर उन्हें किसी का सहारा मिलता है तो उस की जिंदगी खुशहाल बन जाती है. यही वजह है कि बदलते समय के साथ रूढि़वादी समाज के दकियानूसी ढांचे ढह रहे हैं और बच्चे खुद आगे बढ़ कर अपने मातापिता की शादी की पहल कर रहे हैं.

आज बच्चे 60-70 वर्ष की उम्र में भी अपने माता या पिता के सूने जीवन में खुशियां भर रहे हैं और हैरानी की बात यह है कि उन्हें इस राह में अब सौतेले मातापिता का भी एहसास नहीं होता. उन के साथ बच्चों का व्यवहार दोस्ताना रहता है. बच्चों के मातापिता ही नहीं बल्कि बच्चों के जीवन में भी अपने मां या पिता के न रहने से जो खालीपन आ गया था वह भी भर जाता है.

बेटे ने बढ़ाया हौसला

अपनों के बीच नारायण मजूमदार.

कोलकाता के एक राष्ट्रीयकृत बैंक के सीनियर स्टाफ नारायण मजूमदार अपने एक बेटे और पत्नी के साथ सुखी गृहस्थी चला रहे थे. लेकिन वर्ष 2005 में मैलिगनैंट मलेरिया ने उन की गृहस्थी उजाड़ दी. इस बीमारी से पत्नी की मृत्यु हो गई. पत्नी के इस तरह अचानक चले जाने की घटना ने उन्हें भीतर से तोड़ कर रख दिया. पत्नी के बगैर वे अपनी गृहस्थी की कल्पना भी नहीं कर सकते थे. लेकिन उस समय उन के 16 वर्ष के बेटे अर्नव ने पिता को संभाला. कुछ समय पश्चात पिता के अकेलेपन को देख कर कभीकभी अर्नव भी विचलित हो उठता. इस बीच उस की बूआ शिकागो से कोलकाता आईं. उन्होंने अपने भाई नारायण को फिर से शादी करने की सलाह दी. पर वे नहीं माने. बूआ के चले जाने के बाद नारायण के बेटे अर्नव ने भी पिता को शादी के लिए जोर देना शुरू किया. आखिरकार पत्नी की मृत्यु के 3 वर्ष के बाद वे दूसरी शादी के लिए मान ही गए.

नारायण मजूमदार बताते हैं, ‘‘अर्नव बहुत ही सुलझा हुआ लड़का है. मेरे हामी भरते ही उस ने अखबार के मैट्रिमोनियल कौलम में लड़की देखनी शुरू की. जहां कहीं भी लड़की देखने मैं गया, बेटा भी साथ गया. 2-3 जगह लड़की देखने के बाद एक को पसंद कर लिया गया. शादी के दिन बेटा खुद गाड़ी चला कर पिता को यानी मुझे मैरिज रजिस्ट्रेशन औफिस ले कर गया.’’

नारायण आगे बताते हैं, ‘‘मैरिज रजिस्ट्रेशन औफिस से बाहर निकल मैं ने बेटे के सामने निष्कपट मन से स्वीकार किया कि उस की जगह पर अगर मैं होता तो शायद अपने पिता को शादी के लिए नहीं मनाता. शादी के बाद अर्नव घर गया और मेरी व पत्नी के स्वागत की तैयारी भी की.’’

नारायण अपनी पत्नी सुचरिता के साथ सुखी दांपत्य जीवन जी रहे हैं. अर्नव सुचरिता को मामोन कह कर बुलाता है. यादवपुर यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग और फिर आईआईएम से एमबीए कर के आज अर्नव कुवैत में एक मल्टीनैशनल कंपनी में इंजीनियर है. वह अपने पिता और मामोन से बराबर संपर्क में रहता है.

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