कभी शादियां बहुत बड़ा सामाजिक उत्सव होती थीं. ऐसा उत्सव जिस में भारी संख्या में लोग शामिल होते थे. बरातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं होती थी. लड़के वाले 300 बरातियों की बात कर के 600-700 बराती ले कर लड़की वालों के दरवाजे पर धूमधड़ाके के साथ पहुंचते थे. लेकिन भारी संख्या में बराती देख लड़की वाले घबराते नहीं थे. उन्होंने ऐसी किसी स्थिति से निबटने के लिए पहले से ही पूरी तैयारी कर रखी होती थी. उन दिनों कैटरिंग सिस्टम नहीं था. बरात के लिए खाना तैयार करने हेतु हलवाई बिठाए जाते थे जो अपने काम में बेहद माहिर होते थे. एक तरह से बरात को निबटाने की सारी जिम्मेदारी हलवाइयों की होती थी.

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