लेखक-रमाकांत मिश्र एवं रेखा मिश्र

मेरा और ममता का दर्द एक ही था. हम दोनों ही विधुर थे. हमारे बेहद नजदीकी लोगों ने चाहा भी कि हम दोनों एक कश्ती में सवार हो कर हमसफर बन जाएं पर अपनेअपने दर्द की चादर ओढ़े हम दोनों जीवन के भंवर में फंसे जीते रहे. हमें क्या पता था कि अपनी राह चलने वाला मुसाफिर कभी एक राह का हमसफर भी बन जाता है...

Tags:
COMMENT