‘‘सुप्रिया कहां हो तुम?’’ ललिता देवी फोन रखते ही  बेचैनी से चिल्लाईं.

‘‘घर में ही हूं, मां. क्या हो गया? इस तरह क्यों चीख रही हो?’’ सुप्रिया ने उत्तर दिया.

‘‘यही तो समस्या है कि तुम घर में रह कर भी नहीं रहतीं. पता नहीं कौन सी नई दुनिया बसा ली है तुम ने.’’

‘‘मां, मुझे बहुत काम है. प्लीज, थोड़ा धीरज रखो. एक घंटे में आऊंगी. अभी तो मुझे सांस लेने तक की भी फुरसत नहीं है,’’ सुप्रिया ने अपनी व्यस्तता का हवाला दिया.

‘‘देखा, मैं कहती थी न, सुप्रिया तो घर में रह कर भी नहीं रहती. कई सप्ताह बीत जाते हैं, हमें एकदूजे से बात किए बगैर,’’ ललिता ने टीवी देखने में व्यस्त अपने पति, पुत्र व दूसरी पुत्री नीरजा से शिकायत की पर किसी ने उन की बात पर ध्यान नहीं दिया.

‘‘मैं भी कुछ कह रही हूं न. कोई मेरी भी सुन ले,’’ झुंझला कर उन्होंने टीवी बंद कर दिया. टीवी बंद करते ही भूचाल आ गया.

‘‘क्या कर रही हो, ललिता? मैं इतना महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम देख रहा हूं और तुम ने आ कर टीवी बंद कर दिया. मुश्किल से 10-15 मिनट के लिए टीवी देखता हूं मैं. तुम से वह भी सहन नहीं होता,’’ उन के पति अपूर्व भड़क उठे.

‘‘और भी गम हैं जमाने में...’’ ललिता बड़ी अदा से बोलीं.

‘‘मैं शेर सुनने के मूड में नहीं हूं. पहेलियां मत बुझाओ. रिमोट मुझे दो और जल्दी बताओ, समस्या क्या है?’’ वे बोले. उन के पुत्र प्रताप और पुत्री नीरजा ने जोरशोर से पिता की बात का समर्थन किया.

‘‘तो पहले मेरी समस्या सुन लो, बाद में टीवी देख लेना.’’

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