जहां यह बेहद संतोष की बात है कि भारतीय मूल के इंगलैंड निवासी व ब्रिटिश नागरिक ऋषि  सुनक कंजर्वेटिव पार्टी के मुख्य सदस्यों के 40 फीसदी से अधिक वोट प्रधानमंत्री पद की दौड़ में ले सके, वहीं सवाल उठता है कि भारतीय मूल के लोग आखिर इंगलैंड, अमेरिका में हैं क्यों और क्यों नहीं वे अपने देशनिर्माण के लिए भारत में बसते और भारत को इंग्लैंड बनाने में मदद करते. यह न भूलें कि एक भारतीय की प्रतिव्यक्ति आय डौलरों में 2,000 के आसपास है और एक ब्रिटिश जने की 46,000 यानी भारतीय से 23 गुना अधिक.

ऋषि  सुनक और उन की पत्नी अक्षता मूर्ति जो भारतीय टैक कंपनी इंफ़ोसिस के नारायण मूर्तित की पुत्री हैं, आखिर क्यों विदेशों में जाते हैं, बस जाते हैं और वहां रह कर अपने देश के निर्माण की बातें सारे मंचों पर करते हैं.

ऋषि  सुनक की चुनाव सभाओं में भारत का कहीं जिक्र नहीं था. विश्वगुरु बनने का सपना देखने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ में उन के फोटो नहीं बांटे गए. वे हरदम एक गोरों के देश के नेता की तरह रहे, जिस देश ने भारत पर 200 से ज्यादा साल राज किया और जिस के राज को हम क्रूरता व लूट का राज बताते नहीं थकते. उस देश की मिट्टी की गंध लिए ऋषि  सुनक आखिर क्यों कंजर्वेटिव पार्टी के सदस्य बने, चुनाव लड़े.

भारत में भारतीय जनता पार्टी का बड़ा मुद्दा सोनिया गांधी का इटली मांबाप की संतान होना है. इस का इस्तेमाल वे ही लोग करते हैं जो हाल के महीनों में इंतजार कर रहे थे कि ऋषि  सुनक किसी तरह ग्रेट ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बन जाएं. यह एक दोगलापन है जो हमारी संस्कृति में पगपग पर बिखरा है. और जो भारतीय अपना सबकुछ समेट कर इंगलैंड, अमेरिका, आस्ट्रेलिया या कहीं और हमेशाहमेशा के लिए बस जाते हैं, वे भी भारतीय राजनीति में पैसे या भारतीय नेता की उस विदेश में विजिट पर जोरजोर से नगाड़े बजाते हैं.

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