देश के संविधान की मूल आत्मा असल में वोटतंत्र में नहीं, आवाज की स्वतंत्रता में है. हर स्वतंत्रता, कानून का राज, अपनी संपत्ति रखने का हक, बिना कारण गिरफ्तारी से बचने का हक, बराबरी का हक और यहां तक कि अंधविश्वासी व कट्टरपंथी बने रहने का हक भी विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता से मिलता है. सुप्रीम कोर्ट आजकल इस पर सुनवाई कर रहा है, क्योंकि विचारों में विभिन्नता को कुचलने के लिए भारतीय दंड विधान की कुछ धाराओं का जम कर दुरुपयोग किया जाता है.

धार्मिक विश्वासों को चोट पहुंचाने के भारतीय दंड विधान में कई प्रावधान ऐसे हैं, जिनके जरिए बड़ी आसानी से मुकदमे दायर कर दिए जाते हैं और मुकदमा दायर करने वाला मजे में घूमता रहता है, जबकि अपनी स्वतंत्रता को बचाने वाला अदालतों के गलियारों की ठोकरें खाता है. हिंदू धर्म की अतार्किक, असहिष्णु, अन्यायी मान्यताओं व उस के अय्याश देवी-देवताओं की पोल खोलने के चलते दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं पर हिंदू कट्टरपंथियों ने मुकदमे किए. संपादकों ने जब एक-एक बात को स्वयं हिंदू धर्मग्रंथों से प्रमाणित करना चाहा, तो मामले ठंडे पड़ गए और विरोधी मुंह छिपाते रह गए. इन मामलों में कट्टरपंथियों की बंद आंखें और बंद दिमाग देख कर वास्तव में आश्चर्य होता है.

पहले कांग्रेस सरकार और अब भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार दोनों इस विषय पर एकमत हैं कि धार्मिक अंधविश्वासों को फैलाने का अधिकार तार्किक व सत्यता को प्रस्तुत करने से ऊपर है. वे दोनों ही कहते रहे हैं कि हम सांप को पूजें या शेर को, हम कान में सीसा डलवाने को सच कहें या जातिगत भेदभाव को ईश्वर की देन, हम झूठे व मक्कारों की पूजा करें या बेईमानी को भगवान की लीला मानें, यह हमारी धार्मिक स्वतंत्रता है.

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