नोटबंदी के कहर के बाद अब औरतों को डिजिटल पेमैंट का कहर सहने को तैयार रहना होगा. अब तक औरतें अपना पैसा अपने पास कनस्तरों, दराजों, साडि़यों में छिपा कर रखती थीं पर अब यह तो संभव होगा ही नहीं, कार्ड से पेमैंट करने में जब भी चूक हुई समझ लें कि पैसा हाथ से गया. डिजिटल पेमैंट के चाहे कितने गुण गा लिए जाएं यह पक्का है कि डिजिटल पेमैंट के पीछे का चेहरा किसी को न दिखेगा. अगर कहीं कुछ गलत हुआ तो मोबाइल फोन लिए बैठे बटन दबाते रहो और मंदिरों की तरह रामधुन के रिकौर्ड सुनते रहो. आप की शिकायत पर कोई सुनवाई नहीं होगी. पंडितों के तंत्रमंत्रों के उतने पेच नहीं होंगे जितने इस डिजिटल पेमैंट के फौर्मूलों में हैं.

जो पुरुष कंप्यूटरों पर काम करते हैं वे तो इस गोरखधंधे को समझ सकते हैं पर सामान्य औरतों के लिए, चाहे वे भारत की हों या अमेरिका की, उन के लिए इस डिजिटल सांपसीढ़ी के खेल को समझना कठिन होगा. असल में डिजिटल पेमैंट का खेल बैंकों से जुड़ी कंपनियों का लूट का अपना तरीका है, जो उन्होंने दुनिया भर में सरकारों के साथ मिल कर जनता पर थोपा है ताकि हर नागरिक की हर बात का पूरा ब्योरा उन के पास रहे. अब औरत की अपनी छिपी संपत्ति कहीं नहीं रह पाएगी.

डिजिटल वर्ल्ड भले लगे कि काम आसान कर रहा है पर प्राइवेसी व सुगमता पर यह हमला है और सरकार व बैंक मिल कर हर जने को एक पैसा कमा कर टैक्स देने वाली मशीन में बदल रहे हैं. युवा अभी चाहे इस पर खुश हों कि उन्हें जेब में मोटा पर्स नहीं ले कर चलना पड़ेगा पर वे नहीं जानते हैं कि उन पर किसकिस तरह का अंकुश लग रहा है. उन की हर गतिविधि सरकार की निगाह में तो बाद में आएगी, मातापिता की निगाह में पहले आ जाएगी. अगर औरतें भी कार्ड पेमैंट या मोबाइल पेमैंट करेंगी तो उन्हें मोटा नुकसान होगा, क्योंकि पति महाशय को पता चल जाएगा. औरतों को अपनी आर्थिक स्वतंत्रता को इस तरह से नरेंद्र मोदी के भाषणों में बहने नहीं देना चाहिए. यह थोपा नहीं जाए, मनमरजी से हो. जिसे जरूरत हो वह अपनी इच्छानुसार पैसे का इस्तेमाल करे. करेंसी नोट पहले बंद कर के और फिर जानबूझ कर कम जारी कर के सरकार जमाखोरों से भी ज्यादा जघन्य अपराध कर रही है. मजेदार बात तो यह है कि अंधविश्वासी इस में व्रतउपवास सा कष्ट देख रहे हैं कि इस के बाद चमत्कार होगा और फिर स्वर्णयुग आ जाएगा. याद रखें कि इस काली गुफा के बाद गहरा गड्ढा है जिस से निकलना आसान न होगा.

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