कुछ समय पहले तक गांव, कसबे और शहर में मेहतरमेहतरानियों द्वारा सिर पर मैला उठा कर ले जाने और फिर दोबारा हाथ धोपोंछ कर घरों से रोटी ले जाने के दृश्य आम थे. नाई द्वारा दलितों के बाल काटने व दुकानदार द्वारा इन्हें चाय देने से मना करने जैसे विवाद भी आम थे.

आजादी के बाद बने कानूनों और बदलती सोच के चलते पिछले 15-20 सालों से इस सामाजिक विभाजनकारी व अन्यायी व्यवस्था के ये दृश्य कम हो गए थे.

आज पूरी दुनिया में वर्ग विभाजन के विरुद्घ संघर्ष चल रहा है, सामाजिक, आर्थिक बराबरी वाले समाज की ओर कदम बढ़ाने की ताकीद की जा रही है, लेकिन विश्वगुरु बनने का दावा करने वाले भारत में समाज को फिर से खंडखंड करने के कायदे रचे जा रहे हैं. पहले से ही गहरी धार्मिक, जातिगत विषमताओं वाले भारतीय समाज में विभाजन की खाई और बढ़ाने की तैयारी हो गई है.

सरकार ने कालाधन, भ्रष्टाचार रोकने के नाम पर कैशलैस सोसाइटी बनाने की घोषणा कर के देश में एक नए सामाजिक विभाजन की नींव डाल दी है. कैशलैस सोसाइटी एक नई तरह की वर्णव्यवस्था है. धार्मिक, आर्थिक, कौर्पोरेट राजपुरोहितों की सलाह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा रचित मनीस्मृति में साफतौर पर मनुस्मृति की पे्ररणा की झलक दिखाई दे रही है.

कैशलैस सोसाइटी के इस नए वर्णभेदी समाज में बाकायदा ऊंचनीच, भेदभाव, छुआछूत, सामाजिक व आर्थिक बहिष्कार, हुक्कापानी बंद करने, रोटीबेटी के संबंध न रखने जैसे खाप पंचायती फैसलों की पक्की व्यवस्था है.

ठीक उस तरह जैसे मनुस्मृति की वर्णव्यवस्था में ब्राह्मण को श्रेष्ठ बताया गया है. लिखा है,

उत्तमांगोद्भवाज्ज्यैष्ठयाद

ब्रह्मणश्चैव धारणात्,

सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मण: प्रभु:

        (मनुस्मृति - 1-88)

अर्थात् वेद पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ कराना, करना, दान देना और लेना, इन कर्मों को ब्राह्मणों के लिए बनाया है.

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