शहर में लाॅक डाउन की घोषणा होते ही इक्कीस दिन के लिए पहली बार न चाहते हुए भी मुझे अपनी दुकान बंद करनी पड़ी. खुद की नहीं, पर अपने मातहतों की चिंता थी मुझे. उन्हें तुरंत ही घर जाने को कहा.
देश में फ़ैल रही महामारी से मैं बहुत चिंतित था, पर अपनी मृत्यु को लेकर नहीं, क्योंकि मैं तो जीवित होकर भी मृतप्राय जैसा था.
घर में मेरी पत्नी की भौंहें हमेशा तनी रहतीं, बच्चों से भी महिनों बातें नहीं होती, होती भी तो, उनकी फरमाइशों पर. क्या करुं ? इस मंहगाई के दौर में यदि मैं मेहनत न करुं तो सबकी जरुरतें कैसे पूरी हों.
रात को बारह बजे दुकान बंद कर जब मैं घर पहुंचता था, थक कर चकनाचूर हो चुका होता था. दिनभर ग्राहकों की चिक-चिक के कारण किसी से बात करने की इच्छा ही नहीं होती थी. खाना खाने के बाद नींद की आगोश में चला जाता था. सुबह सात बजे उठकर नित्यकर्म से निपटकर, नाश्ता कर फिर दुकान के लिए निकल जाता था.
सभी इसीलिए मुझसे नाराज़ रहते थे क्योंकि मैं उन्हें समय ही नहीं दे पाता था. कभी कभी मुझे लगता है कि मैं जीता जागता रोबोट हूं. जिसमें कोई इच्छाएं न कोई संवेदनाएं है,बस दूसरों की खातिर काम किये जा रहा हूं.
आज चारों ओर दहशत और सन्नाटा पसरा है, पर यह सन्नाटा मुझे प्रभावित नहीं कर रहा, क्योंकि मेरे अंदर तो वर्षो से सन्नाटा है. या यूं कहें इस सन्नाटे का मैं आदी हो चुका था ही.
आज जैसे ही मैं दुकान बंद कर आठ बजे घर पहुंचा, पत्नी ने ऐसे घूर कर देखा जैसे अजायबघर से कोई प्राणी आया हो. मैं बाहर से तो शांत पर अंदर से अशांत था. मन में कई बातें घुमड़ रहीं थीं. इन दिनों में कुछ नया करना चाह रहा था. ताकि घर के माहौल में बदलाव आ सके. मैंने फोन उठाया और दो पिज्जा आर्डर किये. पत्नी को खाना बनाने से मना किया तो आश्चर्य से मेरा चेहरा देखते हुए पूछ बैठी "तबियत तो ठीक है न."
तभी पिज्जा भी आ गया पत्नी के चेहरे की सिलवटें कुछ कम हुई. बच्चों को भी आवाज देकर डायनिंग टेबल पर बुलाया. पिज्जा देखते ही दोनों के चेहरे खिल उठे. सबने मुस्कुराते, बातें करते पिज्जा का आनंद लिया घर में फैली धुंध भी कम हो रही थी. मेरे अंदर भी खुशी अंकुरित हो रही थी.
परिवार के साथ बैठकर मैंने पहली बार पूरी फिल्म देखी मुझे तो याद भी नहीं इसके पहले मैंने कब फिल्म देखी थी मैं तो अब तक आटे-दाल में ही उलझा रहा कभी फुर्सत ही नहीं मिली.
अब मुझे लाॅक डाउन इतना भी बुरा नहीं लग रहा था इसी की वजह से तो मुझे परिवार के साथ समय बिताने का अवसर मिला. सुबह उठने पर मुझे हल्कापन लग रहा था मन भी शांत था रोज की तरह भाग- दौड़ जो नहीं थी. मैं सोच रहा था कि रोज रोज परांठे सब्जी का नाश्ता करते ऊब गया आज कुछ और खाया जाए. तभी पत्नी ने नाश्ते के लिए आवाज दी. नाश्ते में उसने बच्चों की पसंद का पास्ता बनाया था.
पास्ता तो मैंने कभी नहीं खाया था और खाने का मन भी नहीं था.
"अरे! पापा खाकर तो देखिए, बहुत अच्छा लगता है."
 मैं बच्चों का अनुरोध टाल न सका खाने पर मुझे नया स्वाद अच्छा लगा. अभी तक तो मैं नाश्ता और खाना पेट भरने के लिए खाता था, स्वाद लेने का समय ही कहां था मेरे पास.
इन इक्कीस दिनों में  मैंने खाने की विविधता और स्वाद का भरपूर आनंद लिया. घर मुझे घर जैसा लग रहा था. पत्नी के चेहरे की सिलवटें खत्म हो गईं थीं, मुझे वह फिर से जवान लगने लगी थी. घर की धुंध भी छट चुकी थी खुशियों का उजाला फैला हुआ था. मैं भी रोबोट से संवेदनशील इंसान बन गया था.

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