सरित प्रवाह, मार्च (द्वितीय) 2014
संपादकीय टिप्पणी ‘फांसी की सजा’ में आप के विचार पढ़े. 16 मार्च के टाइम्स औफ इंडिया में निर्भया केस पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और 6 साल की लड़की का एक माइनर (17 साल) द्वारा रेप किए जाने की खबरें छपी थीं. मेरे मन में भी एकदम वही विचार उठे जो आप ने लिखे हैं यानी ‘यहां हर अपराध पर फांसी की मांग की जाती है पर अदालतें कू्ररतम जुर्म के बावजूद मुजरिम को फांसी के बजाय आजन्म कारावास दे सकती हैं.’
संक्षिप्त में दोनों खबरें कुछ इस प्रकार थीं : सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया गैंग रेप केस में अपने ही फैसले पर थोड़ा संशोधन किया था. उस ने कहा कि 4 में से 2 दोषियों को फांसी 31 मार्च तक रोक दी जाए और दूसरी खबर में 17 साल के लड़के ने 6 साल की लड़की का रेप किया था जिसे पकड़ लिया गया था.
2 साल पहले निर्भया गैंग रेप के बाद, महीनों आंदोलन चले, नए कानून बने, करोड़ों रुपयों के बजट तय किए गए, नेताओं ने वादे किए, टीवी चैनलों पर बहसें हुईं, लेकिन नतीजा क्या निकला? 6 बदमाशों में 1 माइनर होने की वजह से बच गया, दूसरे ने सूसाइड कर लिया, बाकी 4 को फांसी सुनाई गई, उस में भी 2 की फांसी अभी रोक दी गई. जल्द ही बाकी 2 के भी वकील दरख्वास्त दे देंगे ताकि उन को भी आजन्म कारावास हो जाए. मेरे हिसाब से यदि फाइल अधिक समय तक राष्ट्रपति के यहां पड़ी रहती है तो सजा राष्ट्रपति को मिलनी चाहिए न कि सजा को कम कर देना चाहिए. यह अन्याय है उन लोगों के साथ जिन्होंने न्याय मांगा था या न्याय किया था.
यदि आखिर में सबकुछ हो जाने के बाद हमें दोषी की सजा कम ही करनी है तो नए रेप मामलों में क्यों समय और पैसा बरबाद करें. जैसे दूसरे केस में लड़के को पकड़ तो लिया गया है परंतु वह तो वैसे ही छूट जाएगा क्योंकि वह अभी नाबालिग है.
मेरी समझ में नहीं आता कि केवल भारत में ही क्यों ऐसी मुश्किलें आती हैं. दूसरे देशों में अन्याय पर काबू पा लिया जाता है पर हमारे यहां कोई न कोई दोषियों को बचा ही लेता है. रेप केस में फांसी बहुत जरूरी है और जैसे ही कोर्ट का फैसला सुनाया जाता है तुरंत उस पर ऐक्शन होना चाहिए. बल्कि मैं तो कहूंगा कि राष्ट्रपति के पास कोई फाइल भेजने की जरूरत ही नहीं है.
ओ डी सिंह, बड़ौदा (गुजरात)
*
आप की टिप्पणी ‘जोड़तोड़ की राजनीति’ पढ़ी. सत्ता पाने की खातिर अपने ईमानधर्म को गिरवी रखने वाले सत्तालोलुप नेताओं की वर्तमान कारगुजारियों का आप ने अच्छा खुलासा किया है. जनता को कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर इन तथाकथित देशभक्तों ने न केवल बांटा, बल्कि भाईभतीजावाद और स्वार्थसिद्धि के लिए देश की अस्मत को भी दांव पर लगा दिया. वे केवल तभी अपने घडि़याली आंसू बहाते नजर आते हैं जब जनता से उन्हें वोट लेना होता है. न कोई सिद्धांत, न कोई स्वच्छ विचार. इन की हर कथनीकरनी में षड्यंत्र की बू आती है. अगर वर्षों से सोई पड़ी जनता अभी भी नहीं जागी तो दुनिया की कोई ताकत उसे स्वार्थी नेताओं के फंदे से निजात नहीं दिला सकती.
छैल बिहारी शर्मा, छाता (उ.प्र.)
*
संपादकीय टिप्पणी ‘जोड़तोड़ की राजनीति’ रोचक, सामाजिक, सामयिक लगी. बहुत समय पहले से ही पार्टियों की यह धारणा रही है कि जिस का पलड़ा भारी देखा उस की तरफ बढ़ गईं. किसी में धर्म, ईमान, कायदाकानून की कोई सोच नहीं होती, उसे केवल अपना फायदा देखना होता है. भाजपा की बढ़त की उम्मीद देखते हुए रामविलास पासवान भाजपा के पाले में आ गए और लालू प्रसाद यादव के राजद के कई विधायक नीतीश कुमार के खेमे में चले गए हैं. दूसरे दलों में भी इस तरह का जोड़तोड़ जरूर होगा क्योंकि कांगे्रस का जहाज डूबता नजर आ रहा है. 
भाजपा में नरेंद्र मोदी की जो हवा चली है वह मोटे पैसे के मोटे प्रचार से बनी. और जब से कांगे्रस ने प्रचार में अपना और सरकारी पैसा झोंकना शुरू किया है, नरेंद्र मोदी का कद घटने लगा है. नरेंद्र मोदी असल में व्यापारी वर्ग की देन हैं जो हिंदू धर्म की आस्था के नाम पर डरासहमा रहता है और जिस में नीची जातियों के प्रति बहुत ज्यादा पौराणिक घृणा ठूंसठूंस कर भर दी गई है. केंद्र में नरेंद्र मोदी अपने बल पर अटल बिहारी वाजपेयी से ज्यादा बड़ी शख्सीयत बनेंगे, यह सवाल बहुत बड़ा है. अटल बिहारी वाजपेयी खासे बेदाग, सौम्य, कुशल वक्ता, कवि, अनुभवी व्यक्ति हैं और ये गुण मोदी में न के बराबर हैं. अब सारा दारोमदार जनता के हाथों में है कि वह किसे सत्ता सौंपती है.
कैलाशराम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)
*
‘आप और जनसेवा’ शीर्षक से प्रकाशित आप के विचार पढ़े. आप का यह कहना कि ‘आप’ जन आंदोलन का राजनीतिक चेहरा है, सोफे पर जिंदगी गुजारने वालों का पार्किंग प्लेस नहीं-यही सचाई बयां कर रहा था कि ‘हथेली पर सरसों उगाने को लालायित या फिर आननफानन ही आसमान से तारे तोड़ लाने की सोच से ग्रस्त ‘आप’ शायद अपने गठन का असली मकसद ही भूल गई है. इस का उदाहरण है, ‘आप’ में भरती होने वाले तत्त्वों का ‘स्टेटस सिंबल’. मसलन, जिस तरह से देश के प्रख्यात, प्रतिष्ठित, बौद्धिक, धनाढ्य तथा सैलिब्रिटीज ‘गण्यमान्य’ लोग बिना किसी हिचक के ‘आप’ की सदस्यता ग्रहण कर रहे हैं, उस में उन का मकसद चाहे जो कुछ भी हो, ‘आप’ की छवि को खास चेहरे में परिवर्तित करते अवश्य नजर आ रहे हैं. 
ऐसे में ‘आप’ के असली कार्यकर्ताओं में बेचैनी बढ़ना स्वाभाविक है, क्योंकि इन नएनवेले मगर ‘खास’ सदस्यों में ही जिस तरह से सदस्यता ग्रहण करते ही लगेहाथों थाली में परोसपरोस कर आम चुनाव हेतु लोकसभाई क्षेत्रों के टिकट भी बिना किसी जांचपड़ताल या देरी के बांटे जा रहे हैं वह आम/असली कार्यकर्ताओं को किनारे लगाए जाने का सुस्पष्ट संकेत ही है. सो, अगर ‘आप’ के आम आदमी सदस्य अपने ही दल के दिग्भ्रमित नेतृत्व से सवाल करें कि क्या ‘आप’ या केजरीवाल अपनी राह नहीं भटक गए या ‘आप’ क्यों ‘खाप’ वाली छवि में बदल रही है, तो गलत क्या है? इसलिए ‘आप’ के ठेकेदारों को यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि अगर आम आदमी भी उन की तरह राह भटक गया तो ‘आप’ की क्या हालत होगी?
टी सी डी गाडेगावलिया, करोल बाग (न.दि.)
*
संपादकीय टिप्पणी ‘तर्क और तथ्य’ में आप ने बहुत सही चेताया है कि ये आधुनिक विकास की पहली सीढ़ी हैं तथा सुखी परिवार इन्हीं पर समृद्ध होते हैं. यह सच है कि किसी बुजुर्ग को परिवार अपना गुरु मान कर जीता है लेकिन इस के अलावा बाहर के लोग भी सलाह देते रहते हैं. यदि परिवार के बुजुर्ग और बाहर के सलाहकार खुद स्वार्थ से ग्रसित, अहंकार से भरे तथा दकियानूसी सलाह दें तो ये दुर्गुण स्वत: परिवार और समाज में चले आते हैं. बाहरी व्यक्ति अपने स्वार्थ को तलहटी में रख सलाह देते हैं.
धर्म के नाम पर भी सलाह की तलहटी में रखे स्वार्थ के कारण हमारा देश अंधविश्वासी और कमजोर बना और विदेशी हजारों साल तक भारत को लूटते व शासन करते रहे. इस अवैज्ञानिक सलाह से भारत में आधुनिक विज्ञान जन्म नहीं ले सका, उसे पश्चिमी देशों में जन्म लेना पड़ा. हम आज तक अंधविश्वास वाली सलाह पर जी रहे हैं.
माताचरण पासी, देहरादून (उत्तराखंड)
*
एकतरफा बात क्यों
लेख ‘पिछलग्गू बन रहे भाजपा के बड़े नेता’ ने यही दर्शाया कि ‘अगर किसी का विरोध करना ही है तो फिर आंख खोल कर करो या बंद आंखों से, चेहरामोहरा तो खिसियानी बिल्ली समान बनाना ही पड़ेगा न.’ लेखक के ये शब्द कुछ ऐसा ही उजागर कर रहे हैं, ‘नमो अभी चुनाव जीते नहीं हैं, पर उन्होंने अपने को पीएम मानना शुरू कर दिया है, इसलिए रैलियों के प्रबंधन व संचालन में जमीन से जुड़े नेताओं की उपेक्षा की जा रही है.’ यह तो मैं नहीं जानता कि लेखक महोदय अंधता के शिकार हैं या नहीं, मगर उन की एकतरफा बात यह अवश्य जता रही है कि उन्हें शायद काने समान, एकतरफ का ही दिखाई देता है, दूसरी आंख से जरा भी नहीं. क्या वे यह बता सकते हैं कि अगर भाजपा में बुजुर्गों व जमीन से जुड़े नेताओं या कर्मठ कार्यकर्ताओं की अनदेखी की जा रही है तो आज कांगे्रस की कमान किस के हाथों में और क्यों है, राजद के लालू यादव के दल में किस को और क्यों आगे बढ़ाया जा रहा है, जदयू में नीतीश, बसपा में मायावती, अन्नाद्रमुक में जयललिता, तृणमूल में ममता बनर्जी, सपा में मुलायम सिंह या फिर ‘आप’ में क्या अरविंद केजरीवाल की अलंबरदारी/ तानाशाही नहीं चल रही है? मात्र भाजपा या नमो के विरोध का ही राग अलापने से क्या देश की ये शेष सभी पार्टियां दूध की धुली या फिर सौ प्रतिशत शुद्ध सोना हो गई हैं? 
यहां मेरा विरोध इस बात का नहीं है कि लेख में क्यों नमो का विरोध किया गया, बल्कि कहना यह है कि एकतरफा बात कर, लेखक महोदय ऐसा कौन सा तीर चला रहे हैं कि उन्हें फूलमाला पहनाई ही जाए. धर्म का विरोध करें, मगर अपना कर्म भी तो न भूलें.
ताराचंद देव रैगर, श्रीनिवासपुरी (न.दि.)
*
महिलाओं का शोषण
कुछ दिन हुए हरियाणा की मंत्री किरण चौधरी को एक जनसभा में भाषण देते हुए पत्थरों से मारा गया. वे अब गुड़गांव के एक अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ कर रही हैं. महिलाओं के खिलाफ हिंसा क्यों बढ़ रही है यह आज एक सवाल है.
सीता और द्रौपदी के जमाने से नारी पर अत्याचार हो रहे हैं. क्या हमारे धर्म में कोई कमजोरी है? क्या अभी तक लोग इस कहावत को नहीं भूले कि ‘ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी. सकल ताड़ना के अधिकारी.’ आज तो नारी हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है, फिर भी उसे पशु समझता जाता है? 
आई पी गांधी, अंबाला (हरियाणा)
*
भाजपा के नेता?
मार्च (द्वितीय) अंक में प्रकाशित लेख ‘पिछलग्गू बन रहे भाजपा के बड़े नेता’ पढ़ा. जनता की नब्ज को पहचानना आसान नहीं. राजनीतिक पार्टियां फिल्मों के प्रचार की तरह प्रचार कर रही हैं. फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ पर बहुत पैसा लगा था और बड़ा प्रचार हुआ था फिर भी फिल्म फ्लौप हो गई. आज भी कुछ ऐसे हालात हैं. कौन बनेगा प्रधानमंत्री, कोई कुछ नहीं कह सकता. सब लीडर प्रधानमंत्री बनने के लिए काला धन खर्च कर रहे हैं. परंतु कौन जीतेगा, अंदाजा लगाना कठिन है. 
यदि भाजपा की 272 सीटें आ भी जाएं तो प्रधानमंत्री की कुरसी के लिए भाजपा के लीडरों में लड़ाई होगी. लालकृष्ण आडवाणी, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज आदि सब प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं.
इंदर गांधी, करनाल (हरियाणा)
*
आधी आबादी का दर्द
लेख ‘पंचायतों का औरतों पर जुल्म’ हृदयघातक है. पश्चिम बंगाल के लाभपुर की निर्लज्जतापूर्ण घटनाएं पंचायतों के अंदर छिपी हुई कुत्सित भावना को प्रकट करने के साथ ही हमारे देश में कुछ जगहों पर चल रही समानांतर व्यवस्था किस प्रकार राजनीतिक रंग में रंगी है, इसे भी दिखाती हैं. यही कारण है कि लाभपुर जैसी घटनाएं अकसर घटती रहती हैं. केवल यही नहीं, मनुष्य के निजी व सामाजिक जीवन से जुड़ी बातों पर भी खाप और सालिसी सभा का पूर्ण दबाव है जोकि इस लेख को पढ़ने से ज्ञात हुआ है. 
अभी तक जनता के सामने इस समानांतर व्यवस्था के दिनोंदिन फलनेफूलने का सत्य क्या है, यह स्पष्ट नहीं था. लेकिन अब ज्ञात हुआ कि अपने राजनीतिक लाभ के लिए ही प्रशासन इन्हें चलने दे रहा है वरना मजाल है कि संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिकों के मौलिक अधिकारों का इस प्रकार न केवल हनन हो बल्कि इस के एवज में उसे आदिम युग के दंड भी मिलें. बड़े आश्चर्य की बात है कि आधी आबादी की याद राजनीतिक दलों को केवल वोटिंग के समय ही आती है. उसे नग्न कर के प्रताडि़त करते समय सभी राजनीतिक दल इस बात को भूल जाते हैं. चलिए, इसे छोड़ भी दीजिए. स्त्री किसी की मां, बेटी, बहन है, इसे भी थोड़ी देर के लिए भूल जाएं. पीडि़ता किस जातिप्रजाति या वर्ण की है, इसे भी सजा का आधार न बनाएं. तब क्या उस के साथ इस प्रकार के इंसानियत को बेचने वाले व्यवहार को कोई उचित ठहराएगा? दुख तो इसी बात का है कि आज ऐसा ही हो रहा है और प्रशासन मूक बना बैठा रहता है अथवा मात्र खानापूर्ति करता है.
कृष्णा मिश्रा, लखनऊ (उ.प्र.) 

आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें

डिजिटल

(1 साल)
USD10
सब्सक्राइब करें

डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन

(1 साल)
USD79
सब्सक्राइब करें
और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...