एक बहुत पुरानी कहावत है ‘पेड़ बबूल का बोओगो तो कांटे ही मिलेंगे’. इसी कहावत को चरितार्थ करती है फिल्म ‘दिल साला सनकी’. कथानक के स्तर पर यह फिल्म ऐसा कुछ नही पेश करती जिसके चलते इसे देखने के लिए गाढ़ी कमाई खर्च की जाए.

एक औरत को लेकर युद्ध होना, दो दोस्तों का दुश्मन बन जाना, महाभारत होना आम और घिसी पिटी कहानी है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि बचपन में एक बच्चे को किसे अपना आदर्श चुनना चाहिए, इसके जवाब की इस अति लचर पटकथा वाली फिल्म से की भी नहीं जानी चाहिए.

फिल्म की कहानी के केंद्र में बादल है. और शहर का गुंडा बच्चा भाई (जिम्मी शेरगिल) हैं. पांच वर्ष के बच्चा को एक छोटे शहर के गुंडे तिवारी दद्दा ने उठाकर अपने बेटे की तरह पाला और उसे अपनी तरह दबंग गुंडा ही बनाया. एक दिन ऐसा आता है, जब बच्चा, तिवारी दद्दा की हत्या कर खुद उस शहर का नामी गुंडा बच्चा भाई बन बैठता है. शहर की पुलिस भी उन्हीं के इशारे पर नाचती है.

शहर के एक नाई का आठ वर्षीय बेटा बादल, बच्चा भाई को अपना आदर्श मानता है. उसकी महत्वाकांक्षा बच्चा भाई की तरह गुंडा बनना है. बड़ा होकर बादल (योगेश कुमार), बच्चा की शरणागति स्वीकार कर उनके लिए काम करने लगता है. बहुत जल्द बादल, बच्चा भाई का अतिविष्वासी बन जाता है. शहर में आकर बसे मास्टर शर्मा (शक्ति कपूर) की बेटी मेघा (मदालसा शर्मा) को बादल दिल दे बैठता है. पर मेघा उसे नापसंद करती है. मास्टर शर्मा जी को भी यह रिश्ता पसंद नही.

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