आरएसएस से घोषित और अधिकृत तौर पर भाजपा में आए राम माधव की स्थिति 12वें खिलाड़ी जैसी है जो मैदान पर पानी की बोतल ले जाते वक्त ही नजर आता है लेकिन अब जरूरत पड़ी तो भाजपा ने उन्हें एक अहम काम सौंप दिया है. यह काम बड़ा ही चुनौतीपूर्ण और शायद ही हो सकने वाला है कि जम्मूकश्मीर में महबूबा मुफ्ती भाजपा के साथ गठबंधन धर्म निभाने को न्यूनतम शर्तों पर तैयार हो जाएं. पीडीपी की इस नई मुखिया को समझ आ रहा है कि अब भाजपा की उंगली थामे रखने का सीधा मतलब है बनाबनाया वोटबैंक हाथ से जाने देना. लिहाजा, वे यहांवहां की शर्तें थोप कर गठबंधन से किनारा करने की कोशिश कर रही हैं. भाजपा के लिए भागीदारी वाली इस सत्ता को छोड़ना जमीन को बंजर करने जैसी बात होगी. मुफ्ती मोहम्मद सईद की मौत के बाद घाटी की सियासत अब तक अधर में लटकी है तो उस की एक बड़ी वजह महबूबा की समझदारी भी है जो जल्दबाजी न दिखाते सोनिया गांधी और उमर अब्दुल्ला को भी घाटी में भाजपा के होने के खतरे का एहसास करा रही हैं वरना सारे पत्ते तो उन के हाथ में हैं ही. 

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