Muslims’ in US Election: भारत में मुसलमानों को बार बार उनकी औकात बताने वालों, मुसलमानों से वोटिंग का अधिकार छीनने वालों के मुंह पर अमेरिकी मिड टर्म चुनाव का नतीजा एक करारे थप्पड़ की तरह पड़ा है.

जिस अब्दुल को भारत में पंचर लगाने, बिरयानी बेचने, कबाड़ बीनने और छोटी-मोटी दुकान चलाने तक सीमित कर देने की कोशिश दक्षिणपंथी विचारधारा की सरकार में लम्बे समय से हो रही है, उसी अब्दुल ने सात समंदर पार अमेरिका में इतिहास रच दिया है.

अब अब्दुल सिर्फ पंचर नहीं लगाएगा, बल्कि दुनिया के सबसे ताकतवर लोकतंत्र की संसद के उच्च सदन यानी अमेरिकी सीनेट में बैठकर कानून बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा बनेगा. इस अब्दुल का पूरा नाम है अब्दुल एल-सैयद. मिशिगन से अमेरिकी सीनेट का चुनाव जीतकर अब्दुल एल-सैयद ने इतिहास रच दिया है. वह अमेरिकी सीनेट में पहुंचने वाले पहले मुस्लिम हैं.

42 वर्षीय अब्दुल एल-सैयद पेशे से डॉक्टर और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं. उनका जन्म 1984 में अमेरिका के मिशिगन राज्य के रोचेस्टर हिल्स में हुआ था. उनके पिता मोहम्मद एल-सैयद मिस्र के अलेक्जेंड्रिया शहर से अमेरिका आए थे. इस तरह अब्दुल एल-सैयद एक मिस्रवंशी अमेरिकी मुस्लिम हैं, जिनका भारत से रिश्ता उनकी पत्नी के परिवार के जरिए जुड़ा है. उनकी पत्नी सारा जुकाकू एक भारतीय-अमेरिकी हैं. सारा का परिवार भारत में कर्नाटक में बसा है, तो इस लिहाज से अब्दुल एल-सैयद भारत के दामाद भी हुए. अब्दुल और सारा की दो बेटियां हैं.

नाम नहीं, काम के आधार पर मिला जनादेश

अब्दुल एल-सैयद की जीत महज एक चुनावी जीत नहीं है. यह उन तमाम लोगों के मुंह पर तमाचा है जो किसी इंसान की काबिलियत को उसके धर्म, नाम, खानपान और पहनावे से तौलते हैं. डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व वाली दक्षिणपंथी रिपब्लिकन सरकार में अब्दुल एल-सैयद को भी चुनाव में अपने काम और राजनीतिक विचारों के साथ-साथ अपनी धार्मिक पहचान को लेकर भी विरोध और इस्लामोफोबिक हमलों का सामना करना पड़ा. उनके प्रतिद्वंद्वी खेमे ने उन्हें कट्टरपंथ से जोड़ने की कोशिश की, लेकिन धन्य हैं अमेरिकी लोग, जिन्होंने ट्रंप की मनमानियों से इतर लोकतंत्र की महत्ता को समझा, जागरूक हुए और अब्दुल के नाम या धर्म के बजाय उनके काम और वादों को महत्व देकर उन्हें संसद तक पहुंचाया.

दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों ने अब्दुल के मुस्लिम होने को चुनावी हथियार बनाने की काफी कोशिश की. रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स और उनके समर्थकों ने उनको कट्टरपंथ से जोड़ने का प्रयास किया. इसके बावजूद मिशिगन के मतदाताओं ने अब्दुल एल-सैयद को चुना. क्योंकि अब्दुल एल-सैयद का चुनावी मुकाबला केवल नीतियों और विकास के मुद्दों तक सीमित नहीं था, उन्होंने महंगाई, आम परिवारों की आर्थिक मुश्किलों, सबके लिए स्वास्थ्य सुविधाओं और राजनीति में कॉरपोरेट कंपनियों के प्रभाव को कम करने जैसे मुद्दों पर चुनाव लड़ा था.

भारत में उपेक्षित अब्दुल

जहां भारत में मुसलमानों को उनकी नागरिकता, देशभक्ति और वफादारी का प्रमाण देने के लिए बार-बार कटघरे में खड़ा किया जाता है, उसी मुस्लिम समाज से आने वाले अब्दुल ने अमेरिका में अपनी पहचान के साथ लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्थाओं में से एक तक पहुंचने का रास्ता बनाया है. यह जीत भारत के उन लोगों के लिए भी एक आईना है जो हर वक्त मुसलमानों को उनकी औकात बताने की ताल ठोंकते रहते हैं.

भारत में भी अनेकानेक अब्दुल हैं. वे डॉक्टर हैं, इंजीनियर हैं, प्रोफेसर हैं, वैज्ञानिक हैं, खिलाड़ी हैं, पत्रकार हैं और उद्यमी भी हैं. लेकिन मोदी सरकार में नफरत की राजनीति ने अब्दुल की पहचान को कुछ चुनिंदा सांचों में ढाल रखा है. मोदी सरकार की नजर में अब्दुल पंचर बनाने वाला, दरी बिछाने वाला, सब्जी बेचने वाला, गोहत्यारा, लवजिहादी, आतंकवादी मात्र है. अब्दुल को कभी पाकिस्तान भेजने की सलाह दी जाती है, कभी उसकी देशभक्ति पर सवाल उठाया जाता है, कभी उसके खानपान को लेकर भीड़ कानून अपने हाथ में ले लेती है और सड़क पर पीट पीट कर उसे अधमरा कर देती है, तो कभी उसकी दाढ़ी, टोपी और नाम को शक की निगाह से देखती है.

नफरती भाषणों का शिकार अब्दुल

भारत में मुसलमानों के खिलाफ नफरत केवल सड़कों पर ही नहीं दिखाई देती. India Hate Lab की जनवरी 2026 में जारी रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाले 1,318 घृणास्पद राजनीतिक भाषणों की घटनाएं दर्ज की गईं. इनमें 1,289 घटनाओं में मुसलमान निशाने पर थे.

रिपोर्ट के मुताबिक 308 भाषणों में मुसलमानों के साथ हिंसा की खुली अपील की गई थी. यह सामान्य राजनीतिक बयानबाजी नहीं है, बल्कि यह सामाजिक माहौल बिगाड़ने और बदलने का संकेत है, जिसमें किसी समुदाय को लगातार देश का दुश्मन साबित करने की कोशिश की जा रही है.

गली-मोहल्लों में ‘मियां पंचर वाला’ कहकर उसका मजाक उड़ाने वालों को शायद यह पता ही नहीं कि इसी देश के मुसलमानों ने चिकित्सा, शिक्षा, विज्ञान, साहित्य, कला, खेल और कारोबार के क्षेत्र में कितनी बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं. लेकिन जब किसी समुदाय की छवि को जानबूझकर एक मजाक में बदल दिया जाए तो उसकी प्रतिभा और मेहनत पर पर्दा डालना आसान हो जाता है.

नागरिकता से लेकर रोजगार तक परेशान अब्दुल

मोदी सरकार ने एक तरफ ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा दिया और दूसरी तरफ मुसलमानों के सामने रोजमर्रा की जिंदगी में अपनी नागरिकता, रोजगार, सुरक्षा और सम्मान बचाने की चुनौती खड़ी कर दी. चुनाव आयोग के कारनामों की चर्चा आजकल गर्म है, जिसके आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने तो चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की जीत सुनिश्चत करने के लिए एसआईआर की आड़ में देश के तमाम अब्दुल्लाओं से उनकी नागरिकता का हक़ तक छीन लिया.

अब्दुला की कभी नाम पूछ कर सरेआम पिटाई हो जाती है, कभी गाय के नाम पर उसकी हत्या कर दी जाती है, कभी उसके बच्चों को शिक्षा देने और दो वक्त खाना देने वाले मदरसों को बंद कर दिया जाता है तो कभी उस पर लगे आरोप के चलते उसके मकान-दुकान पर बुलडोजर चला कर उसके पूरे परिवार को खुले आसमान के नीचे खड़ा कर दिया जाता है.

अब्दुल के अपराध की सजा परिवार को क्यों?

सवाल यह है कि अगर किसी व्यक्ति ने अपराध किया है तो सजा उसे अदालत देगी या कानूनी प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही सरकार उसका घर ढहा कर पूरे परिवार को सजा देगी?

क्या किसी बच्चे का घर इसलिए उजाड़ दिया जाना चाहिए कि उसके पिता पर कोई आरोप लगा है? किसी औरत को इसलिए बेघर कर दिया जाना चाहिए कि उसके शौहर पर कोई इल्जाम लगा है या किसी मांबाप को बुढ़ापे में सिर से छत छीन कर दर दर की ठोकरें खाने के लिए इसलिए मजबूर कर दिया जाएगा कि उनके बेटे पर कोई आरोप लगा है?

बुलडोजर न्याय की शुरुआत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने की और देखते ही देखते सभी भाजपा शासित राज्यों ने उनका अनुकरण कर न्यायपालिकाओं का काम बुलडोजर को थमा दिया.

असम में बेदखली, उत्तर प्रदेश में बुलडोजर कार्रवाई और अलग-अलग राज्यों में मुस्लिम कारोबारियों तथा रेहड़ी-पटरी वालों के बहिष्कार की मांगें एक ऐसे माहौल की ओर इशारा करती हैं, जिसमें मुसलमानों को बराबरी का नागरिक मानने के बजाय संदेह की निगाह से देखा जाता है. ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी अपनी रिपोर्टों में मुस्लिम समाज के खिलाफ भेदभाव, जबरन बेदखली और दमनकारी कार्रवाइयों पर चिंता जताई है.

अमेरिका में जीवित लोकतंत्र

अब जरा अमेरिका की तरफ लौटते हैं. भारत की तरह अमेरिका भी भेदभाव से मुक्त देश नहीं है. वहां भी नस्लवाद, इस्लामोफोबिया और प्रवासियों के खिलाफ जबरदस्त राजनीति होती है. डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति में भी मुस्लिम पहचान को लेकर विवाद और हमले देखने को मिले हैं. अब्दुल एल-सैयद को भी डोनाल्ड ट्रंप ने जिहादी कहा था. लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती यह है कि वहां एक मुस्लिम उम्मीदवार इन हमलों के बावजूद चुनाव जीतकर सीनेट तक पहुंच सकता है.

अब्दुल की जीत के साथ अमेरिकी सीनेट में मुस्लिम प्रतिनिधित्व का एक नया अध्याय शुरू हुआ है. वह जनवरी 2027 में पदभार ग्रहण करेंगे. अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में कोई 12 मुस्लिम नेताओं ने अपनी जीत दर्ज की है. यह उस लोकतांत्रिक व्यवस्था की उपलब्धि है, जिसमें किसी नागरिक की धार्मिक पहचान उसके राजनीतिक अधिकारों के रास्ते की दीवार नहीं बनी.

हुनर किसी धर्म की जागीर नहीं

अब्दुल एल-सैयद ने तो अपना परचम लहरा दिया. अब जरूरत इस बात की है कि भारत में भी हर अब्दुल को बिना डर, बिना भेदभाव और बिना किसी की कृपा के अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिले क्योंकि हुनर किसी धर्म की जागीर नहीं होता. अब्दुल एल-सैयद की सफलता यह बताती है कि अवसर और लोकतांत्रिक भागीदारी मिलने पर एक साधारण परिवार से आने वाला व्यक्ति भी इतिहास बना सकता है. किसी लोकतंत्र की असली जीत तब होती है जब उसके नागरिक की पहचान उसका धर्म नहीं, उसका काम और उसका अच्छा इंसान होना होता है.

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