China: कभी टीवी के धारावाहिक आम आदमी की जिंदगी का आईना हुआ करते थे, आज वे चमक-दमक, महंगे गहनों, आलीशान घरों और साजिशों की काल्पनिक दुनिया रच रहे हैं. सोशल मीडिया ने भी दिखावे और फर्जी अमीरी की होड़ को तेज किया है. नतीजा यह कि मध्यमवर्ग अपनी हैसियत से बाहर जाकर खर्च करने और कर्ज लेकर अमीर दिखने की कोशिश में उलझता जा रहा है. चीन ने इस तरह के भ्रामक ग्लैमर पर लगाम लगाने की पहल की है, लेकिन भारत में इस पर बहस तक नहीं हो रही है.

चीन में सोशल मीडिया पर आम जीवन को ग्लैमराइज करने पर सरकारी नियंत्रण लगा दिया है. उसने फर्जी अमीरों की छवि गढ़ने, लग्जरी जीवनशैली का दिखावा करने और ज्योतिष, वास्तु तथा अंधविश्वास के नाम पर लोगों को ठगने वाले सोशल मीडिया कंटेंट पर भी कार्रवाई की है.

30 सितंबर 2026 को चीन के साइबरस्पेस प्रशासन ने दो महीने का अभियान शुरू किया है. इसमें किराये की महंगी गाड़ियों, आलीशान बंगलों और लग्जरी सामान के जरिए अमीर होने का झूठा दिखावा करने, फर्जी अमीरी के जरिए कारोबार करने तथा फेंगशुई और ज्योतिष के नाम पर लोगों को गुमराह करके पैसे कमाने वाले कंटेंट को सोशल मीडिया से हटाया जा रहा है.

चीन सरकार ने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के लग्जरी कारों, महंगे गहनों, आलीशान घरों और विलासितापूर्ण जीवन के प्रदर्शन पर भी कार्रवाई की है, कई चर्चित इन्फ्लुएंसर्स के सोशल मीडिया अकाउंट बंद कर दिए गए हैं.

फर्जी जीवनशैली पर नियंत्रण करने के लिए साइबरस्पेस प्रशासन ने फर्जी गरीब, नकली किसान, दिखावटी संघर्ष, फर्जी अमीरी और झूठी सफलता की कहानियों के जरिये व्यूज और पैसा कमाने वाले वीडियो पर कठोर कार्रवाई की है. यही नहीं, सरकार ने प्लेटफॉर्मों को ऐसे कंटेंट की पहचान करने और कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं, जिन्हें भ्रामक या सामाजिक मूल्यों के विरुद्ध माना जाता है.

सादगी, श्रम और आत्मनिर्भरता पर जोर

चीन में आम लोगों के सामान्य जीवन, उनकी खुशियों या रोजमर्रा की गतिविधियों को दिखाने पर प्रतिबंध नहीं है. चीनी सरकार की कार्रवाई मुख्यतः भ्रामक जीवनशैली, फर्जी पहचान, दिखावटी अमीरी और ग्लैमरस कंटेंट पर केंद्रित है. चीन में अपने नागरिकों को बचपन से ही मेहनत करना, अपने काम खुद करना, किसी न किसी हस्त कौशल में पारंगत होना, अनुशासन में रहना और आत्मनिर्भर होना सिखाया जाता है.

चीन के अधिकांश स्कूलों में बच्चे अपने क्लास रूम की सफाई खुद करते हैं. वे बेंचेज साफ़ करते हैं, स्कूल की बगिया में पेड़-पौधों की देखभाल करते हैं. स्कूलों में पढ़ाई के साथ साथ उन्हें किसी न किसी कौशल को सीखना होता है ताकि पढाई खत्म होते ही वे आत्मनिर्भर बन सकें. यही वजह है कि भारत के बराबर जनसंख्या वाला चीन आर्थिक और तकनीकी रूप में हमसे कहीं आगे है. चीन ने अपने सोशल मीडिया पर बढ़ रहे दिखावे और ग्लैमर को समय रहते भांप लिया है और उसपर रोक लगाने के उपक्रम शुरू कर दिए हैं.

सवाल यह है कि मनोरंजन और सोशल मीडिया के नाम पर हम किस तरह का समाज गढ़ रहे हैं? क्या किसी इंसान की हैसियत उसके कपड़ों, गहनों, महंगी गाड़ियों और आलीशान घरों से तय होगी? क्या खुश रहने के लिए जरूरी है कि हम दूसरों को अपनी अमीरी दिखाएं? बाजार ने हमारी इच्छाओं को जरूरतों में और जरूरतों को दिखावे की होड़ में बदल दिया है. टीवी और सोशल मीडिया मिलकर एक ऐसी काल्पनिक दुनिया रच रहे हैं, जिसमें आम आदमी अपनी असली जिंदगी से असंतुष्ट होने लगा है. वह अपनी हैसियत से बाहर जाकर खर्च करता है, कर्ज लेता है और फिर भी उस चमकदार दुनिया का हिस्सा नहीं बन पाता है.

मालगुड़ी डेज से अनुपमा तक : बदल गई टीवी की दुनिया

भारत में भी रंगीन परदे से लेकर सोशल मीडिया की रील्स तक में छद्म ग्लैमर के चक्रव्यूह में आम आदमी फंसा हुआ है. 80 और 90 के दशक में टीवी पर आने वाले धारावाहिकों में जिंदगी की सादगी, रिश्तों की गर्माहट और आम आदमी के संघर्ष की कहानियां दिखाई देती थीं. मालगुड़ी डेज, हमलोग, नुक्कड़, करमचंद और ऑफिस-ऑफिस जैसे धारावाहिकों के किरदार हमें अपने आसपास के लोगों जैसे लगते थे. उनकी जिंदगी में न महंगी गाड़ियों का शोर था, न आलीशान बंगलों की चकाचौंध और न ही हर वक्त ब्रांडेड कपड़ों का प्रदर्शन. जीवन के 45-50 बसंत पार कर चुके लोगों की स्मृतियों में बचपन में देखे गए उन धारावाहिकों की यादें आज भी ताजा हैं. लेकिन उनकी तुलना आज के धारावाहिकों और उनके कलाकारों से करें तो आज हालात बिल्कुल उलट हैं.

टीवी सीरियल हों, वेब सीरीज हों या सोशल मीडिया की रील्स, हर तरफ अमीरी का प्रदर्शन, दिखावटी रिश्ते और विलासिता की चमक दिखाई देती है. कहानी में दम हो या न हो, लेकिन किरदार के पास करोड़ों की गाड़ी, आलीशान बंगला, महंगे कपड़े और नौकरों की फौज जरूर होनी चाहिए.

वसुधा, तुम से तुम तक, सेहर होने को है, ये फितूर तेरा, मन्नत, अनुपमा जैसे सीरियलों में दिखाई जाने वाली दुनिया आम आदमी की जिंदगी से बहुत दूर है. कहीं सास-बहू की साजिशें हैं, कहीं रिश्तों में धोखा, कहीं बदले की आग तो कहीं नागिन, पुनर्जन्म और चमत्कारों का खेल. कहानी इतनी उलझी हुई कि दर्शक समझ ही नहीं पाता कि कौन किसका अपना है और कौन किसकी जिंदगी बर्बाद करने पर तुला है.

गहनों से लदी नायिकाएं और गायब होती आम औरत

इन धारावाहिकों की महिला किरदार घर में हों या पार्टी में, सुबह हो या रात, सिर से पांव तक सोने-हीरे के गहनों से लदी नजर आती हैं. भारी-भरकम साड़ियां, महंगे कपड़े, आलीशान मकान और हर वक्त सजने-संवरने का प्रदर्शन. मानो औरत की पहचान उसकी समझदारी, मेहनत और आत्मसम्मान से नहीं, बल्कि उसके गहनों और कपड़ों की कीमत से होती हो.

आम घरों की औरतें सुबह से शाम तक घर, नौकरी और बच्चों के बीच पिसती रहती हैं, लेकिन घर घर में चल रहे धारावाहिकों में उनकी जिंदगी का कोई अक्स दिखाई नहीं देता है. आम औरत तो शादी-ब्याह के मौके पर भी इतना साज-सिंगार नहीं करती है, जितना इन धारावाहिकों की नायिकाएं घर के किचन में काम करते हुए सजीधजी दिखाई देती हैं.

धार्मिक कर्मकांड, अंधविश्वास, जादू-टोना और तरह-तरह के टोटकों को भी इन सीरियलों में खूब परोसा जा रहा है. महिलाओं को सचमुच आधुनिक और आत्मनिर्भर दिखाने के बजाय कई बार उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ साजिश रचते, व्रत-पूजा और टोने-टोटके में उलझे दिखाया जाता है. सच तो यह है कि आज घर घर में देखे जा रहे धारावाहिक पितृसत्ता, मनुस्मृति, दक्षिणपंथी विचारधारा और संघ-भाजपाई एजेंडे को विस्तार देते दिखाई दे रहे हैं.

साझा समृद्धि के नाम पर अमीरी के प्रदर्शन पर चीन की सख्ती

चीन ने इस तरह की छद्म ग्लैमर और अमीरी के अंधाधुंध प्रदर्शन पर सवाल खड़े किए हैं. वहां की सरकार ने टीवी धारावाहिकों, वेब सीरीज और तेजी से लोकप्रिय हो रहे माइक्रो-ड्रामा के कंटेंट पर सख्ती शुरू की है. चीन के राष्ट्रीय रेडियो और टेलीविजन प्रशासन (NRTA) ने ऐसे कंटेंट को नियंत्रित करने के लिए दिशा-निर्देश और निगरानी के कदम उठाए हैं, जिनमें बेतहाशा अमीरी, भौतिकवाद और विलासिता को जीवन का आदर्श बनाकर पेश किया जाता है.

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की साझा समृद्धि (Common Prosperity) की नीति है. चीन सरकार का तर्क है कि जब देश में अमीर और गरीब के बीच आर्थिक असमानता मौजूद है, तब मनोरंजन के नाम पर लगातार अरबपतियों की अय्याशी, महंगी गाड़ियों, आलीशान पार्टियों और बेशुमार दौलत का प्रदर्शन समाज में गलत आकांक्षाएं पैदा कर सकता है.

चिंता सिर्फ इतनी भर नहीं है कि लोग अमीरों को देखकर प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि चिंता इस बात की भी है कि मनोरंजन की दुनिया कहीं युवाओं के लिए सफलता का मतलब सिर्फ पैसा, ब्रांडेड कपड़े, महंगी गाड़ियां और अमीर जीवनसाथी हासिल करना न बना दे. आखिर किसी समाज में मेहनत, प्रतिभा, ईमानदारी और संघर्ष का महत्व कम करके हर समस्या का समाधान किसी करोड़पति से शादी या अचानक अरबपति बन जाने में दिखाया जाएगा तो युवाओं की सोच पर उसका असर क्यों नहीं पड़ेगा?

करोड़पति सीईओ और अरबपति प्रेम की कहानियों पर लगाम

बीते सालों में चीनी मनोरंजन उद्योग में ‘डॉमिनेटिंग सीईओ’ यानी दबंग और बेहद अमीर कंपनी मालिक तथा ‘बिलियनेयर रोमांस’ जैसे कथानकों का चलन तेजी से बढ़ रहा था. इन कहानियों में एक साधारण लड़की की जिंदगी तब बदल जाती है, जब उसकी मुलाकात किसी अरबपति कारोबारी से होती है. इसके बाद महंगे होटल, लग्जरी कारें, डिजाइनर कपड़े और आलीशान पार्टियां कहानी का मुख्य हिस्सा बन जाते थे. इन सीरियलों में कई बार प्रेम और रिश्तों को भी दौलत और ताकत के तराजू पर तौला जाता था.

खास तौर पर माइक्रो-ड्रामा की दुनिया में यह प्रवृत्ति तेजी से फैली है. कुछ ही मिनटों के एपिसोड में दर्शकों को अमीरी, बदले, ताकत और असाधारण जीवनशैली की ऐसी दुनिया दिखाई जाती है, जिसका वास्तविक जिंदगी से कोई खास रिश्ता नहीं होता. अब चीन के नियामकों ने ऐसे कंटेंट पर सवाल उठाए हैं. इस तरह के कंटेंट को लेकर शीर्षकों, कथानकों और प्रसारण पर निगरानी बढ़ाई गई है. कई प्रोडक्शन को अपने कंटेंट में बदलाव करने पड़े हैं और कुछ कार्यक्रमों को प्लेटफॉर्म से हटाया भी गया है.

‘मेटियोर गार्डन’ से लेकर ‘टाइनी टाइम्स’ तक

गौरतलब है कि चीन में 2018 में आए लोकप्रिय धारावाहिक ‘मेटियोर गार्डन’ में चार बेहद अमीर युवकों और एक साधारण लड़की की कहानी दिखाई गई थी. यह कहानी पहले भी एशिया में लोकप्रिय रही थी। इसके नए संस्करण को लेकर भी अमीरी के अहंकार, बुलिंग और ताकत के गलत इस्तेमाल जैसे पहलुओं पर बहस हुई.

इसी तरह ‘टाइनी टाइम्स’ फिल्म सीरीज ने चीन में एक अलग ही सामाजिक बहस को जन्म दिया था. इसमें शंघाई के अमीर युवाओं की जिंदगी, महंगे फैशन ब्रांड, आलीशान घर, पार्टियां और चमक-दमक दिखाई गई थी. फिल्म की लोकप्रियता के बावजूद सरकारी मीडिया और आलोचकों ने सवाल उठाया कि क्या मनोरंजन के नाम पर युवाओं को सिर्फ पैसा, उपभोग और दिखावे की दुनिया की ओर धकेला जा रहा है? क्या जीवन की सफलता का पैमाना सिर्फ महंगे कपड़े, महंगे ब्रांड और आलीशान जीवनशैली होना चाहिए?

इस बहस ने चीन में मनोरंजन की दुनिया के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा किया. वहां अब इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि कहानियों में आम लोगों की जिंदगी, मेहनत, सामाजिक रिश्तों और वास्तविक समस्याओं को भी जगह मिले.

सिर्फ सीरियल नहीं, सोशल मीडिया के ग्लैमर पर भी नजर

चीन की सख्ती केवल टीवी और वेब सीरीज तक सीमित नहीं है. सोशल मीडिया पर भी दिखावे और फिजूलखर्ची को बढ़ावा देने वाले कंटेंट पर निगरानी बढ़ाई गई है. महंगी गाड़ियों, लग्जरी घड़ियों, ब्रांडेड कपड़ों और बेशुमार संपत्ति का प्रदर्शन करके लोकप्रियता और कमाई करने वाले कुछ इन्फ्लुएंसर्स के अकाउंट पर कार्रवाई की गई है.

यहां सवाल सिर्फ किसी व्यक्ति के अमीर होने या अपनी संपत्ति का इस्तेमाल करने का नहीं है। सवाल उस संस्कृति का है, जिसमें दौलत का प्रदर्शन ही लोकप्रियता का सबसे बड़ा आधार बनता जा रहा है. सोशल मीडिया पर किसी की सफलता का मूल्यांकन उसकी मेहनत या काम से नहीं, बल्कि इस बात से होने लगा है कि उसके पास कितनी महंगी कार है, वह किस होटल में खाना खाता है और उसकी घड़ी कितने लाख की है.

ज्योतिष, वास्तु और 43 दिन में अमीर बनने का मायाजाल

भारत का सोशल मीडिया भी इसी दिखावे की गिरफ्त में है. हेवी बनारसी साड़ी, मांग में दमकता हुआ चमकदार लाल सिंदूर, बड़ी सी लाल बिंदी, गहरी लिपस्टिक, गले और कान में भारी भरकम सोने के गहने, उँगलियों में बड़ी बड़ी सोने और रत्नजड़ित अंगूठियां धारण किये अनेक एस्ट्रोलॉजर्स की सोशल मीडिया पर आजकल बाढ़ आई हुई है जो यह बताने की कोशिश करती हैं कि अगर आपको लग्जरी लाइफ चाहिए तो आपको खूब सजधज कर रहना होगा. वे बताती हैं कि लक्ष्मी चलायमान है, आप जितना खर्च करेंगे उससे चार गुना लक्ष्मी आपके पास चारों दिशाओं से आएगी.

तमाम ज्योतिषाचार्य आपको बता रहे हैं कि अगर शुक्र ग्रह को प्रभावी बनाना है तो आपको खुशबुओं से नहाना होगा. बड़े बड़े होटलों में जाना होगा और पैसे खर्च करने होंगे. औरतें इन ज्योतिषियों के सम्मोहन और चकाचौंध में खूब डूबी हुई हैं. 43 डेज में इंस्टेंट अमीर बनने का सपना सोशल मीडिया पर दिखाया जा रहा है और लोग अमीर बनने के चक्कर में कर्ज के बोझ में दबते जा रहे हैं. जिस मध्यमवर्ग के लिए कभी सादगी, बचत और संतोष जीवन के मूल्य थे, वह आज कर्ज लेकर अमीर दिखने की होड़ में शामिल हो रहा है.

कर्ज लेकर अमीर दिखने की बढ़ती होड़

भारत में धारावाहिकों और वेब सीरीज में अमीरी का प्रदर्शन किसी बीमारी की तरह फैलता जा रहा है. कहानी किसी मध्यमवर्गीय परिवार की हो या किसी आम लड़की के संघर्ष की, लेकिन उसके घर का इंटीरियर किसी पांच सितारा होटल से कम नहीं होता. घर में नौकरों की कतार, महंगे कपड़े, भारी गहने, विदेशी लोकेशन और आलीशान पार्टियां दिखाई जाती हैं.

वेब सीरीज और शॉर्ट वीडियो ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ा दिया है. सफलता का मतलब बड़ा घर, महंगी गाड़ी, विदेशी छुट्टियां और ब्रांडेड कपड़े बना दिया गया है. प्रेम भी अब कई कहानियों में बराबरी, समझदारी और भावनात्मक जुड़ाव के बजाय पैसे और हैसियत से तय होता दिखाई देता है.

इसका सबसे बड़ा नुकसान उन बच्चों और युवाओं को हो सकता है, जो मनोरंजन और सोशल मीडिया की इन चमकदार तस्वीरों को ही वास्तविक जिंदगी समझने लगते हैं. जब लगातार यही दिखाया जाएगा कि अमीर होना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है और किसी भी तरह उस जीवनशैली तक पहुंचना ही सफलता है, तो साधारण जीवन, मेहनत और संतोष की अहमियत धीरे-धीरे कम होती जाएगी.

मनोरंजन का मतलब समाज को भ्रमित करना नहीं

ऐसा नहीं है कि फिल्मों, धारावाहिकों या वेब सीरीज में अमीर लोगों की जिंदगी नहीं दिखाई जानी चाहिए. अमीरी भी समाज की एक सच्चाई है और उसे पर्दे पर दिखाने में कोई बुराई नहीं है. समस्या तब पैदा होती है, जब अमीरी को ही आदर्श जीवन का एकमात्र पैमाना बना दिया जाए. जब कहानी, अभिनय और सामाजिक सरोकार पीछे छूट जाएं और सिर्फ दौलत की नुमाइश दर्शकों को आकर्षित करने का जरिया बन जाए, तो यह स्थिति देश के लिए खतरनाक है. इसका बुरा असर देश के प्रोडक्शन पर पड़ने के खतरे बढ़ जाते हैं.

चीन की सरकार ने इस दिशा में जो कदम उठाए हैं, उन पर सवाल जरूर उठ सकते हैं. कला और अभिव्यक्ति पर सरकारी नियंत्रण अपने आप में बहस का विषय है. किसी सरकार को यह तय करने का अधिकार कितना होना चाहिए कि दर्शक क्या देखें और निर्माता क्या बनाएं, इस पर लोकतांत्रिक समाज में चर्चा भी शुरू हो गई है. लेकिन चीन में उठी बहस का एक सामाजिक पहलू भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है. वह यह कि मनोरंजन उद्योग की सामाजिक जिम्मेदारी क्या है?

क्या हमारे फिल्मकारों, धारावाहिक निर्माताओं और डिजिटल प्लेटफॉर्म को यह नहीं सोचना चाहिए कि वे समाज को कैसी दुनिया दिखा रहे हैं? क्या दर्शकों को ऐसी कहानियों की जरूरत नहीं, जिनमें किसान, मजदूर, शिक्षक, महिलाएं, छोटे कारोबारी, नौकरीपेशा लोग और संघर्ष करते युवा अपनी वास्तविक जिंदगी के साथ दिखाई दें?

समाज को सच से जुड़ी कहानियां ही मजबूत करेंगी

आज मनोरंजन उद्योग को आत्ममंथन की जरूरत है. सरकार का डंडा चलाए बिना भी निर्माता अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझ सकते हैं. दर्शक भी ऐसे कंटेंट की टीआरपी बढ़ाने में मददगार हो सकते हैं, जिसमें जिंदगी की सच्चाई हो, न कि सिर्फ चमक-दमक.

कभी हमारे धारावाहिक इसलिए लोकप्रिय होते थे क्योंकि उनमें हमें अपना घर, अपना मोहल्ला, अपने रिश्ते और अपनी परेशानियां दिखाई देती थीं. आज स्क्रीन पर सब कुछ है, बस आम आदमी की जिंदगी गायब होती जा रही है.

आखिर मनोरंजन का उद्देश्य हमें कुछ देर के लिए खुश करना है या हमें ऐसी काल्पनिक दुनिया में धकेल देना है, जहां खुशी का मतलब सिर्फ पैसा और विलासिता रह गया है?

चीन ने कम से कम इस सवाल पर बहस तो शुरू की है. भारत में भी अब वक्त आ गया है कि हम पूछें कि क्या हमारे मनोरंजन उद्योग को सिर्फ अमीरों की अय्याशी बेचनी है या समाज की असली जिंदगी भी दिखानी है? China

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