Ramlila Maidan Rally: रामलीला मैदान की रैली विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि देश की राजनीति में बदलते एजेंडे का संकेत है. विपक्षी दलों की एकजुटता और देशभर से उमड़ी भीड़ ने बता दिया कि अब लड़ाई सिर्फ सत्ता की नहीं, वोट के अधिकार और लोकतंत्र को बचाने की है. रामलीला मैदान से उठी आवाज ने मोदी और संघ के हिंदुत्व के एजेंडे को हाशिये पर ढकेल दिया है.

2 नवम्बर 2026, रामलीला मैदान खामोश और अपने एकांत में है. राहुल गांधी की ‘दिल्ली चलो’ रैली समाप्त हो गई है. 1 नवंबर को 21 विपक्षी पार्टियों ने इस संयुक्त रैली में हिस्सा लिया. पूरे देश से आम नागरिक इस रैली के लिए पहुंचे. कोई उसी दिन पहुंचा, कोई दो दिन पहले ही पहुंच गया.

विशाल रामलीला ग्राउंड में हुई यह रैली कोई सामान्य रैली नहीं थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पूरे राजनीतिक करियर में और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने सौ साल के करियर में इस तरह की रैली कर पाने में कभी सफल नहीं हुए. यहां तक कि जय प्रकाश नारायण तक कभी ऐसी रैली नहीं कर पाए.

राहुल गांधी के आह्वान पर 1 नवंबर को रामलीला मैदान आम जनता से खचाखच भरा था. वह तमाम सड़कें जो रामलीला मैदान की ओर जा रही थीं, उन पर लोगों के सिर ही सिर नजर आ रहे थे. हर तरफ से भीड़ का सैलाब उमड़ रहा था, दिल्ली के बॉर्डर पर जगह जगह नाकेबंदी करके जिन लाखों लोगों को रोक दिया गया था, वो भी इस रैली का हिस्सा थे. इस दृष्टि से देखें तो यह एक ऐतिहासिक रैली थी. फ्रीडम मूवमेंट में जिस तरह की रैलियां हुआ करती थीं, राहुल की अगुवाई में विपक्ष की इस रैली ने उसकी याद ताजा कर दी.

कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके के आह्वान पर दिल्ली में जुलाई से जो आंदोलन शुरू हुआ, इसे उसी का विस्तार कह सकते है. जंतर मंतर पर डेढ़ सप्ताह से अधिक समय तक चले आंदोलन में जो निरंतर भूख हड़ताल और धरना चला वह भी ऐतिहासिक था. ‘संसद चलो’ के आह्वान पर तीन लाख से ज्यादा छात्र और नौजवान शामिल हुए थे. संघ या मोदी तो ऐसी किसी रैली का सपना भी नहीं देख सकते. मोदी बेशुमार पैसा खर्च करके भी गुजरात या दिल्ली में इतनी बड़ी रैली का आयोजन नहीं कर पाए. यहां तक की अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी भी नहीं कर पाए. फ्रीडम मूवमेंट में कांग्रेस जिस तरह लोगों को एकजुट करके अंग्रेजों की सत्ता को चुनौती देती थी, राहुल की रैली ने उसी की एक झांकी प्रस्तुत की है.

रैली की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि देश के कोने कोने से लोग अपने खर्चे पर पर आये. 1 नवंबर को पूरा कनॉट प्लेस, मिंटो रोड, दरियागंज का पूरा इलाका, चांदनी चौक की गालियां और रामलीला मैदान लोगों से खचाखच भरा हुआ था. कहीं तिल रखने की जगह नहीं थी. यह भीड़ भारत के आम अवाम की थी, जो लोकतंत्र पर ख़तरा मंडराता देख इकट्ठा हुए थे. इस रैली ने दिल्ली का जितना बड़ा एरिया कवर किया था, उसकी तस्वीरें निकलवा कर मोदी और संघ को देखनी चाहिए.

एक ऐतिहासिक रैली जिसने अब तक की सभी रैलियों में जनता को गोलबंद करने के मानक को पार कर लिया. पूरी रैली बिलकुल शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुई. कहीं कोई दुर्घटना नहीं हुई. कहीं कोई मारपीट नहीं हुई, कहीं कोई लूटपाट नहीं हुई. कहीं कोई अराजकता नहीं हुई. जबकि नरेंद्र मोदी, संघ और बीजेपी का गैंग कई दिनों से इस कैम्पेन में लगा था कि कांग्रेस रैली करके देश में अराजकता फैलाने की कोशिश कर रही है.

मोदी गैंग ने रैली स्थल के आसपास के व्यापारियों, दुकानदारों को भी कोंचा-उकसाया कि रैली से उनका बड़ा नुकसान होगा. उन्हें फ़रियाद के साथ राहुल गांधी के पास भी भेजा कि रैली को दस-बारह दिन के लिए टाल दें. राहुल ने जवाब दिया – ज्ञानेश इस्तीफा दें, रैली 30 सेकंड में ख़त्म हो जाएगी. मोदी गैंग चुप्पी साध गया.

रैली के दिन चांदनी चौक और दरियागंज की गलियों में दुकाने खुली थीं, दूसरे शहरों से दिल्ली आये लोगों ने खूब खरीदारी की. पहाड़गंज के होटल फुल हो गए. कहीं कोई अराजकता पैदा नहीं हुई. कोई पुलिसवाला भी किसी के साथ जूझता या हाथापाई करता नजर नहीं आया. रैली इतनी शांतिपूर्ण थी कि बीजेपी पुलिस की वर्दी में अपने गुंडे तक भेजने की हिम्मत नहीं कर पायी. कभी कभी शान्ति गुंडों पर भारी पड़ती है.

मोदी सरकार और उनकी पुलिस की जो हरकतें जंतर मंतर की रैली में देश और दुनिया ने देखी, उसकी जितनी निंदा हुई और बीजेपी को जितनी गालियां पड़ीं, उसने इतना सबक़ तो दे ही दिया कि अबकी बार उसने पुलिस के भेष में अपने गुंडे नहीं भेजे.

अब बड़ा सवाल यह कि इस महारैली से विपक्ष को, जनता को और देश को क्या मिला?

पहली चीज जो मिली वह है विपक्ष की एकता. चुनाव में वोट चोरी हो रहे हैं और इलेक्शन कमीशन चुनाव में धांधली कर रहा है, इस बात का खुलासा सबसे पहले राहुल गांधी ने किया था. कर्नाटक चुनाव के बाद राहुल ने कई बातें एक्सपोज की थीं. सबूत दिखाए थे, मगर तब विपक्ष ने उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया था. मगर एसआईआर के नतीजों से धीरे-धीरे यह साफ़ हुआ कि लोगों से वोट का अधिकार छीना जा रहा है. इलेक्शन कमीशन ने साढ़े तेरह करोड़ वोटर्स को वोट देने के अधिकार से वंचित किया तो कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके गरज कर बोले – “Gyanesh, You Have Done, Bro!”

अभिजीत की आवाज से लोगों में चेतना बढ़ी. उन्हें समझ में आया कि राहुल गांधी जो बात लम्बे समय से बोल रहे हैं, वह सौ फीसदी सच है. आज सभी विपक्षी पार्टियां इस बात पर एकमत हैं कि चुनाव में धांधली हो रही है. जो दल रैली में आये और जो नहीं भी आये, वह मान रहे हैं एसआईआर में चुनाव आयोग ने मोदी के इशारे पर धांधली की, लोगों से उनके मत का अधिकार छीना.

चुनाव आयोग और उसके आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता की असंवैधानिक गतिविधियों का खुलासा करके 1 नवम्बर की रैली ने पूरे देश में यह मेसेज सम्प्रेषित कर दिया है, कि सत्ता में जो बीजेपी की सरकार बैठी है वह नाजायज तरीके से बैठी है. चुनाव कराने वाली संस्था निष्पक्ष नहीं है, वह मोदी के इशारे पर काम करती है, इलेक्शन मैनुपुलेट करके जीते जा रहे हैं. ये मेसेज लगातार आम जनता में सघन होता जा रहा है. इसी का नतीजा है कि रैली में कई लाख लोग आये.

एक महत्वपूर्ण बात और हुई है. जुलाई में अभिजीत दीपके के आंदोलन के शुरू होने से पहले कांग्रेस लगातार यह कोशिश कर रही थी कि चुनावी भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरा विपक्ष एकजुट हो. दीपके ने चिंगारी दी और राहुल ने जोर लगाया तो उसका नतीजा यह हुआ कि तमाम विपक्षी दलों में आंदोलन की भावना बलवती हुई. अभी तक जो विपक्षी दल अपने अपने क्षेत्र में अलग अलग मोदी सरकार के खिलाफ अपने अपने राग गा रहे थे, वह सब एक मंच पर इकट्ठा हो गए. विपक्ष के आंदोलन में बहुत बड़ी संख्या में आम जनता की शिरकत हुई. यह लोकतंत्र के लिए बड़ा सकारात्मक सन्देश है.

इस रैली की एक बहुत बड़ी उपलब्धि यह है कि पिछले बारह साल में मोदी और संघ ने पूरे देश पर हेट कैंपेन और सामाजिक विभाजन पर आधारित जो हिन्दू एजेंडा, मंदिर एजेंडा, हिन्दू राष्ट्र का एजेंडा और इसी तरह के दूसरे एजेंडे थोप रखे थे, वह सारे के सारे एजेंडे इस एक रैली से कोलैप्स कर गए हैं.

कांग्रेस ने अपने एजेंडे पर सबको एकमत करके मोदी-संघ के हिन्दू एजेंडे को अपदस्त कर दिया है. आम जनता का दिमाग अब हिंदुत्व के एजेंडे से हटकर एसआईआर और इलेक्शन कमीशन के करप्शन पर स्थिर हो गया है. अब लोग अपनी नागरिकता बचाने, अपनी पहचान बचाने के लिए चिंतित हैं. इसके लिए सोशल मीडिया पर मोदी-शाह और चुनाव आयोग को खुलकर गालियां दी जा रही हैं. लोगों में जैसे जैसे जागरूकता बढ़ेगी, मोदी-शाह और संघ की ताकत वैसे वैसे कम होती जाएगी.

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि वोट चोरी महज कानून-व्यवस्था (लॉ एंड ऑर्डर) से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की बुनियाद पर हमला है. इसे किसी प्रशासनिक गड़बड़ी या चुनावी अनियमितता तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता है. यह सीधे-सीधे नागरिकों के मताधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ा मामला है. इसलिए इसे एक व्यापक लोकतांत्रिक एजेंडे के रूप में समझने की जरूरत है. इलेक्शन कमीशन का करप्शन, इलेक्शन कमिश्नर की असंवैधानिक हरकतें और संवैधानिक नियमों का उल्लंघन के खिलाफ जो आवाज उठी है उसने डेमोक्रेसी को देश का प्रमुख मुद्दा बना दिया है. डेमोक्रेसी का एक प्रमुख एजेंडा बनना और हिंदुत्व का प्रमुख एजेंडे से गायब होना, इस रैली की एक असाधारण उपलब्धि है. इसने डेमोक्रेसी के लौटने की संभावनाएं बढ़ा दी हैं.

लोकतंत्र की वापसी और लोकतंत्र के एजेंडे की जितनी सघन प्रक्रिया चलेगी, नरेंद्र मोदी उतने ही कमजोर होते चले जाएंगे. मोदी के ताकतवर होने का कारण बस यही है कि उन्होंने हिन्दू एजेंडा देश के लोगों पर थोपा हुआ है. मगर वोट चोरी, इलेक्शन कमीशन की धांधली, इलेक्शन कमिश्नर की असंवैधानिक हरकतों ने जब बहुसंख्यकों से भी मत का अधिकार छीन लिया है, तो अब सबकी आँखें खुल गई हैं. अब इलेक्शन कमिश्नर को हटाने की मांग, उनको जेल भेजने की मांग जनता की मांग है. डेमोक्रेटिक एजेंडा है. यह कोई बदले की कार्रवाई नहीं है. इस दृष्टि से देखें तो विपक्ष की इस महारैली ने लोकतंत्र को एक प्रधान एजेंडा बना दिया है. अब हिंदुत्व या हिन्दू राष्ट्र हाशिये की चीज है.

लेकिन यह बात ध्यान में रखनी होगी की इम्पीचमेंट से आप ज्ञानेश कुमार को नहीं हटा सकते हैं. इचमेंट में आप भाषण दे सकते हैं. चुनाव में वोट दे सकते हैं. भले आप बीजेपी को वोट न दें, फिर भी वे जीत जाएंगे क्योंकि चुनाव कराने वाली संस्था यह तय कर रही है कि आपका वोट किस पार्टी को जाएगा. इसलिए जब तक देश में आंदोलन तेज नहीं होंगे, निरंतर नहीं होंगे, सघन नहीं होंगे, राष्ट्रव्यापी स्तर पर लगातार नहीं चलेंगे, ज्ञानेश कुमार अपनी कुर्सी छोड़ने वाले नहीं हैं.

ज्ञानेश कुमार की कुर्सी को बचाने की बेचैनी के पीछे आखिर कौन-सा डर काम कर रहा है? क्या उन्हें हटाने या उनकी भूमिका की निष्पक्ष जांच कराने से सत्ता के उन गलियारों में हलचल मचने का अंदेशा है, जहां तक विपक्ष की पहुंच अभी नहीं है?

दरअसल ज्ञानेश कुमार मोदी सिस्टम का वो कैंसर है, जिसका पता उस स्टेज पर चला है कि जब इलाज संभव नहीं है. अब यह कैंसर मरीज को लेकर ही मरेगा. इसलिए कोशिश होगी कि इनकी कुर्सी को न छेड़ा जाए. ज्ञानेश कुमार को छेड़ते ही मोदी और उनकी सरकार भरभरा का गिरेगी. अब यह विपक्ष के ऊपर है कि जब राहुल गांधी ने वोट चोरी को राष्ट्रीय एजेंडे के रूप में स्थापित कर दिया है, तो वह इस मुद्दे को महज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित न रहने दे. विपक्ष एकजुट रह कर लोकतंत्र को बचाने की इस लड़ाई को और तेज करे. यह किसी एक पार्टी, नेता या चुनाव की लड़ाई नहीं है, बल्कि नागरिकों के मताधिकार, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और लोकतंत्र के भविष्य की लड़ाई है. अगर विपक्ष इस निर्णायक मौके पर बिखर गया, तो नुकसान सिर्फ विपक्ष का नहीं, लोकतंत्र का होगा. Ramlila Maidan Rally

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