Karnataka High Court: 2019 में मंगलुरु में सड़क किनारे दीवारों पर कुछ पोस्टर लगे मिले. पोस्टर पर लिखा था कि “सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्याय से वंचित करना है”. यह पोस्टर बाबरी मस्जिद वाले मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ लगाए गये थे. पुलिस ने खुद अपनी तरफ से शिकायत दर्ज की. कहा कि ये पोस्टर पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया ने लगाए हैं और इससे धार्मिक भावनाएं भड़केंगी. फिर 13 लड़कों पर FIR दर्ज कर दी गई. धाराएं लगाई गईं IPC की 153A जो धर्म के आधार पर दुश्मनी फैलाने की है, 295A जो धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने की है और 120B जो साजिश की है.
कर्नाटक हाईकोर्ट में 15 अक्टूबर 2026 को जस्टिस एच पी संदेश ने FIR को रद्द कर दिया. कोर्ट ने साफ कहा कि दीवार पर लिखे शब्दों में 153A और 295A का कोई तत्व नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने खुद कई बार कहा है कि असहमति जताना अपराध नहीं है, जब तक नफरत फैलाने की मंशा न हो इसलिए सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले को गलत कहना अपराध नहीं बनता. ये अभिव्यक्ति की आजादी है जो आर्टिकल 19 भारत के हर नागरिक को देता है. इस फैसले के साथ ही हाईकोर्ट ने फिर से साबित किया है कि सुप्रीम कोर्ट भी गलती कर सकता है और उसकी आलोचना करना जनता का हक है. अवमानना और आलोचना में फर्क होता है.
CJI सूर्यकांत के खिलाफ भी युवाओं को लेकर की गई उनकी एक टिप्पणी को लेकर NLSIU और NALSAR के छात्रों ने विरोध किया था. CJI के कुछ फैसलों से देश भर में उनकी खासी आलोचना भी हुई है. किसी को वो फैसले सही लगे, किसी को गलत लेकिन इस तरह की आलोचना से अदालत की गरिमा बनती है, घटती नहीं.
सही बात तो यह है कि सुप्रीम कोर्ट की गरिमा किसी एक CJI से नहीं, बल्कि सिस्टम से बनती और बिगड़ती है. गरिमा तब कम होती है जब FIR जैसे हथियार से जनता की आवाज को दबाया जाता है. जब मंगलुरु में पोस्टर लगाने पर 13 लड़कों पर देशद्रोह जैसी धाराएं लगा दी जाती हैं, तब गरिमा कम होती है. जब कोई पोस्टर पर न्याय से वंचित करना लिखता है तो वो अदालत को गाली नहीं दे रहा बल्कि वह अदालत से ही न्याय मांग रहा है.
कर्नाटक हाईकोर्ट ने वही बात दोहराई है जो सुप्रीम कोर्ट खुद कहता आया है. असहमति लोकतंत्र की जान है. प्राइम मिनिस्टर हो या चीफ जस्टिस आलोचना अपराध नहीं है. अदालत को मंदिर और जज को भगवान बनाना ठीक नहीं है. अदालतें भी सिस्टम का हिस्सा होती हैं जिनसे गलती होना स्वाभाविक है और कभी कभी आलोचनाओं की वजह से ही ऐसी गलतियों को सुधारा भी जाता है. यही असली सम्मान है. Karnataka High Court




